बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 234, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रवास, नष्टा, मृत, जय, हास्य, रति, मुद, सुदा, भुक्त, ज्वर, कंप और स्थिर ये १२ अवस्थाएँ होती हैं।।२०।। षष्ठिघ्नं गतभं भुक्तघटीयुक्तं युगाहतम्। शराब्धिहल्लभ्यतोऽर्काच्छेषावस्था द्विजोत्तम।।२१।। गत नक्षत्र की संख्या को ६० से गुणाकर उसमें नक्षत्र की भुक्त घटी को जोड़कर ४ से गुणाकर उसमें ४५ से भाग देवे तो लब्धि तुल्य अवस्था होती है। लब्धि १२ से अधिक हो तो उसमें १२ से भाग देने से शेष गत अवस्था होती है।।२१।। प्रवासः प्रवासोपगे जन्मकालेऽर्थनाशस्तु नष्टोपगे मृत्युभीतिः। मृतावस्थिते स्याज्जयायां जयस्तु विलासस्तु हास्योपगे कामिनीभिः।। रतौ स्याद्रतिः क्रीडिता सौख्यदात्री प्रसुप्तापि निद्रां कलिं देहपीडाम्। भयं तापहानिः सुखं स्यात्तु भुक्त्वा ज्वराकम्पितासुस्थितासु क्रमेण।।२३।। अवस्थाओं के नाम के अनुसार ही उनके फल होते हैं।।२२-२३।। अथ लज्जिताद्यवस्था तत्फलं चाह- लज्जितो गर्वितश्चैव क्षुधितस्तृषितस्तथा। मुदितः क्षोभितश्चैव ग्रहावस्थाः प्रकीर्त्तिताः।।२४।। लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित, क्षोभित, ये ६ ग्रहों की अवस्थाएँ होती हैं।।२४।। पुत्रगेहगतः खेटो राहुकेतुयुतो भवेत्। रविमन्दकुजैर्युक्तो लज्जितो ग्रह एव च।।२५।। पाँचवें भाव में ग्रह राहु, केतु, रवि, शनि और भौम से युक्त हो तो लज्जित होता है।।२५।। तुङ्गस्थानगतो वापि त्रिकोणेऽपि भवेत्पुनः। गर्वितः सोऽपि गदितो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२६।। यदि अपनी उच्चराशि वा मूल त्रिकोण में हो तो गर्वित होता है।।२६।। शत्रुगेही शत्रुयुक्तो रिपुदृष्टो भवेद्यदि। क्षुधितः स च विज्ञेयः शनियुक्तो यथा तथा।।२७।।