बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहाणामवस्थाध्यायः २४५ कौतुक अवस्था में हो तो राजा वा धनी, कामकला में कुशल और स्त्रियों का प्रेमी होता है।।७५।। निद्रागते जन्मनि मानवानां कलाधरे जीवयुतं महत्त्वम्। यदाङ्गनासञ्चितवित्तनाशः शिवालये रौति विचित्रमुच्चैः।।७६।। निद्रा अवस्था में हो, गुरु से युत हो तो प्रतिष्ठावान् होता है। गुरु से युत न हो, चन्द्रमा क्षीण हो तो स्त्री और संचित धन का नाश और सियारिन उसके घर में उच्च स्वर से रोती है।।७६।। अथ भौमावस्थाफलम्- शयने वसुधापुत्रे जन्तुरङ्गे व्रणो भवेत्। बहुना कण्डुना युक्तो दद्रुणा च विशेषतः।।७७।। शयन अवस्था में भौम हो तो जातक के शरीर में बहुधा व्रण, खुजली और दाद से पीड़ित रहता है।।७७।। बली सदा पापरतो नरः स्यादसत्यवादी नितरां प्रगल्भः। धनेन पूर्णो निजधर्महीनो धरासुतश्चेदुपवेशनस्थः।।७८।। उपवेशन अवस्था में हो तो पापरत, असत्यभाषी, प्रगल्भ, धन से पूर्ण और अपने धर्म से हीन होता है।।७८।। यदा भूमिसुतो लग्ने नेत्रपाणिमुपागतः। दरिद्रता सदा पुंसामन्यभे नगरेशता।।७९।। यदि नेत्रपाणि अवस्था में लग्न में हो तो सदा दरिद्र, अन्यभाव में हो तो नगरसेठ होता है।।७९।। प्रकाशो गुणस्यापि वासः प्रकाशे धराधीशभर्तुः सदा मानवृद्धिः। सुते भूसुते पुत्रकान्तावियोगो भवेद्राहुणा दारुणो वा निपातः।।८०।। प्रकाशावस्था में हो तो गुणों का विकास, राजा से सम्मान, यदि पाँचवें भाव में भौम हो तो पुत्र-स्त्री का वियोग, राहु से युक्त हो तो घोर पतन होता है।।८०।। गमनागमने कुरुतेऽनुदिनं व्रणजालभयं वनिताकलहः। बहुदद्रुककण्डुभयं बहुधा वसुधातनयो वसुहानिकरः।।८१।।