बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गमन अवस्था में हो तो सदा यात्रा करने वाला, व्रणभय, स्त्री से कलह, दाद, खुजली का भय और धन की हानि होती है॥८१॥ आगमने गुणशाली मणिमाली वा करालकरवाली। गजगंता रिपुहन्ता परिजनसन्तापहारको भौमे॥८२॥ आगमन अवस्था में हो तो गुणी, मणियों की माला धारण करने वाला, भीषण तलवार से युक्त, हाथी पर चलने वाला, शत्रुनाशक, अपने परिजनों के संताप को हरने वाला होता है॥८२॥ तुङ्गे युद्धकलाकलापकुशलो धर्मध्वजो वित्तपः कोणे भूमिसुते सभांमुपगते विद्याविहीनः पुमान्। अन्तेऽपत्यकलत्रमित्ररहितः प्रोक्तेतरस्थानगे- ऽवश्यं राजसभाबुधो बहुधनी मानी च दानी जनः॥८३॥ अपनी उच्चराशि में होकर सभा अवस्था में हो तो युद्धकला में निपुण, धर्मध्वजी, धनी होता है। यदि ५-९ भाव में हो तो विद्या से रहित होता है। १२वें भाव में हो तो पुत्र, स्त्री और मित्र से रहित होता है। इनसे भिन्न स्थानों में हो तो राजसभा का पंडित, बड़ा धनी, मानी और दानी होता है॥८३॥ आगमे भवति भूमिजे जनो धर्मकर्मरहितो गदातुरः। कर्णशूलगुरुशूलरोगवानेव कातरमतिः कुसङ्गमी॥८४॥ आगम अवस्था में भौम हो तो जातक धर्म-कर्म से हीन, रोगी, कान के दर्द एवं बड़े शूलरोग से पीडित, कातरबुद्धि और दुष्टों की संगति करने वाला होता है॥८४॥ भोजने मिष्टभोजी च जनने सबल कुजे। नीचकर्मकरो नित्यं मनुजो मानवर्जितः॥८५॥ भोजन अवस्था में हो तो मिठाई खानेवाला, नीचकर्म करने वाला और अप्रतिष्ठित होता है॥८५॥ नृत्यलिप्सागते भूसुते जन्मिनामिन्दिराराशिरायाति भूमीपतेः। स्वर्णरत्नप्रवालैः सदा मण्डिता वासशाला नराणां भवेत्सर्वदा॥८६॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो राजा के यहाँ से लक्ष्मी की प्राप्ति, सदा सुवर्ण, रत्न, मूंगा आदि से युक्त गृह वाला होता है॥८६॥