भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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.ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४९ निद्राश्रिते चन्द्रसुते न निद्रासुखं सदा व्याधिसमाधियोगः। सहोत्यवैकल्यमनल्पतापो निजेन वादो धनमाननाशः।।९९।। निद्रावस्था में हो तो निद्रा से सुख, आधि-व्याधि से पीडित, सहोदर से हीन, अधिक संताप, अपने कुटुंब से विवाद और धन का नाश होता है।।९९।। अथ गुरोरवस्थाफलम्— वचसामधिपे तु जनुःसमये शयने बलवानपि हीनरवः। अतिगौरतनुः खलु दीर्घहनुः सुतरामरिभीतियुतो मनुजः ।।१००।। यदि जन्मसमय में गुरु शयनावस्था में हो तो बलवान् होते हुए भी जातक हीन शब्द (मंदस्वर), अत्यंत गौरवर्ण, लंबी दाढ़ीवाला और निरंतर शत्रु के भय से युक्त होता है।।१००।। उपवेशं गतवति यदि जीवे वाचालो बहुगर्वपरीत:। क्षोणीपतिरिपुजनपरितप्तः करजङ्घास्यपदव्रणयुक्तः।।१०१।। उपवेशन अवस्था में हो तो वक्ता, अत्यंत गर्वीला, राजा और शत्रु से संताप पानेवाला, हाथ, जंघा, मुख और पैर में घाव से युक्त होता है।।१०१।। नेत्रपाणि गते देवराजार्चिते रोगयुक्तो वियुक्तो वरार्थश्रिया। गीतनृत्यप्रियः कामुकः सर्वदा गौरवर्णो विवर्णोद्भवप्रीतियुक् ।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो रोगी, धन से हीन, गाने-नाचने का प्रेमी, कामी, गौरवर्ण, विजातियों से प्रेम करने वाला होता है।।१०२।। गुणानामानन्द विमलसुखकन्दं वितनुते सदा तेजःपुञ्जं व्रजपतिनिकुञ्जं प्रतिगमम्। प्रकाशं चेदुच्चे द्रुतमुपगतो वासवगुरु- र्गुरुत्वं लोकानां धनपतिसमत्वं तनुभृताम् ।।१०३।। प्रकाश अवस्था में हो तो गुणों का आनंद, स्वच्छ सुख के समूहों का आनंद, तेजस्वी कृष्णचंद्र के स्थान (वृन्दावन) को जाने को उद्यत, यदि गुरु उच्चराशि का हो संसार में मान्यता और कुबेर के समान धनी होता है।।१०३।। साहसी भवति मानवः सदा मित्रवर्गसुखपूरितो सदा। पण्डितो विविधवित्तमण्डितो वेदविद्यादि गुरौ गमं गते ।।१०४।।