बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि गमनावस्था में हो तो साहसी, मित्रवर्ग के सुख से पूर्ण, पंडित, अनेक सम्पत्तियों से युक्त और वेद को जानने वाला होता है।।१०४।। आगमने जनता वरजाया यस्य जनुःसमये हरिमाया। मुञ्चति नालमिहालयमद्धा देवगुरौ परितः परिविद्धा।।१०५।। आगमन अवस्था में हो तो उसके गृह में जनता, सुंदरी स्त्री और लक्ष्मी (धन) सदा उपस्थित रहता है।।१०५।। सुरगुरुसमवक्ता शुभ्रयुक्ता फलाढ्यः सदसि सपदि पूर्णो वित्तमाणिक्ययानैः। गजतुरगरथाढ्यो देवताधीशपूज्यो जनुषि विविधविद्यागर्वितो मानवः स्यात् ।।१०६।। सभावस्था में हो तो बृहस्पति के समान वक्ता, सुंदर मोतियों से युक्त, धन, रत्न, हाथी, घोड़ा, रथ आदि सवारियों से युक्त, इन्द्र से पूज्य और अनेक विद्याओं को जानने वाला गर्वयुक्त होता है।।१०६।। नानावाहनमानयानपटलीसौख्यं गुरावागमे- भृत्यापत्यकलत्रमित्रजसुखं विद्यानवद्या भवेत्। क्षोणीपालसमानतानवरतं चातीव हृद्या मतिः काव्यानन्दरतिः सदा हितगतिः सर्वत्र मानोन्नतिः ।।१०७।। आगमन अवस्था में हो तो संसार में मान-प्रतिष्ठा से युक्त, अनेक वाहन-समूह से युक्त, नौकर, पुत्र, स्त्री, मित्र का सुख, उत्तम विद्या, राजा के समान, अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धिवाला, काव्यप्रेमी, अच्छे मार्ग से चलने वाला और मान-मर्यादा वाला होता है।।१०७।। भोजने भवति देवगुरौ यस्य तस्य सततं सुभोजनम्। नैव मुञ्चति रमालयं तदा वाजिवारणरथैश्च मण्डितम् ।।१०८।। भोजनावस्था में हो तो उसे निरंतर सुंदर भोजन मिलता है, कभी भी धन उसका साथ नहीं छोड़ता है। हमेशा घोड़ा, हाथी, रथ आदि सवारियों से घिरा रहता है।।१०८।। नृत्यलिप्सागते राजमानी धनी देवताधीशवन्द्यः सदा धर्मवित्। तन्त्रविज्ञो बुधैर्मण्डितः पण्डितः शब्दविद्यानवद्यो हि सद्यो जनः ।। नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो राजा से मान्य, धनी, धर्म को जानने वाला, तंत्रविद्या को जानने वाला, पंडितों से घिरा हुआ श्रेष्ठ पंडित और शब्दशास्त्र (व्याकरण) का पंडित होता है।।१०९।।