भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५१ कुतूहली सकौतुके महाधनी जनः सदा निजान्वये च भास्करः कृपाकलाधरः सुखी। निलिम्पराजपूजिते सुतेन भूनयेन वा युतो महाबली धराधिपेन्द्रसद्मपण्डितः।।१९०।। कौतुक अवस्था में हो तो कुतूहली, महाधनी, अपने घर में सूर्य के समान तेजस्वी, कृपालु, सुखी, पुत्र, भूमि से युक्त और नीतिमान्, महाबली और राजपंडित होता है।।१९०।। गुरौ निद्रागते यस्य मूर्खता सर्वकर्मणि। दरिद्रतापरिक्रान्तं भवनं पुण्यवर्जितम्।।१९१।। निद्रावस्था में हो तो वह सभी कर्मों में मूर्खता करने वाला, दरिद्रता से युक्त और पुण्यहीन होता है।।१९१।। अथ भृगोरवस्थाफलम्- जनो बलीयानपि दन्तरोगी भृगौ महारोषसमन्वितः स्यात्। धनेन हीनं शयनः प्रयाते वराङ्गनासङ्गमलम्पटश्च।।१९२।। यदि जन्मसमय शुक्र शयन अवस्था में हो तो जातक बलवान् होते हुए भी दंतरोगी, महाक्रोधी, निर्धन और स्त्रीलंपट होता है।।१९२।। यदि भवेदुशना उपवेशने नवमणिव्रजकाञ्चनभूषणैः। सुखमजस्रमरिक्षय आदरादवनिपादपि मानसमुन्नतिः।।१९३।। उपवेशन अवस्था में हो तो नूतन मणि, सुवर्ण के आभूषणों से सुखी, शत्रुओं का नाश करने वाला, राजा से आदर और प्रतिष्ठा में वृद्धि वाला होता है।।१९३।। नेत्रपाणिं गते लग्नगेहे कवौ सप्तमे मानभे यस्य तस्य ध्रुवम्। नेत्रपाते निपातो धनानामलं चान्यभे वासशाला विशाला भवेत्।। नेत्रपाणि अवस्था में शुक्र लग्न, सप्तम वा दशम भाव में हो तो नेत्रहीनता के कारण धन का नाश होता है व अन्य भाव में हो तो बड़ा मकान होता है।।१९४।। स्वालये तुङ्गभे मित्रभे भार्गवे तुङ्गमातङ्गलीलाकलापीजनः। भूपतेस्तुल्य एव प्रकाशं गते काव्यविद्याकलाकौतुकी गीतवित्।।