भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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२६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रकाश अवस्था में हो और अपने उच्च, स्वगृह वा मित्रगृह में हो तो मतवाले हाथी के समान बलवान्, राजा के सदृश धनी, सुखी, काव्य और संगीत में पारंगत होता है।।१९५।। गमने जनने शुक्रे तस्य माता न जीवति। आधियोगो वियोगश्च जनानामरिभीतितः ।।१९६।। गमन अवस्था में हो तो माता नहीं जीती है, मानसिक चिन्ता, बंधुओं का वियोग और शत्रु से भय होता है।।१९६।। आगमनं भृगुपुत्रे गतवति वित्तेश्वरो मनुजः। सत्तीर्थभ्रमणशाली नित्योत्साही करांघ्रिरोगी च।।१९७।। आगमन अवस्था में हो तो महाधनी, तीर्थयात्री, उत्साही और हाथ- पैर के रोग से युक्त होता है।।१९७।। अनायासेनालं सपदि महसा याति सहसा प्रगल्भत्वं राज्ञः सदसि गुणविज्ञः किल कवौ। सभायामायाते रिपुनिवहहन्ता धनपतेः समत्वं वा दाता बलतुरगगन्ता नरवरः।।१९८।। सभावस्था में हो तो अनायास ही अपने ही प्रताप से राजदरबार में प्रगल्भता होती है। स्वयं गुणी, शत्रु का नाश करने वाला, महाधनी दाता और हाथी तथा घोड़े की सवारी पर चलनेवाला होता है।।१९८।। आगमे भार्गवे नागमो जन्मिनामर्थराशेररातेरतीव क्षतिः। पुत्रपातो निपातो जनानामपि व्याधिभीतिः प्रियाभोगहानिर्भवेत् ।। आगमन अवस्था में हो तो शत्रु द्वारा धन की अधिक हानि, पुत्र, परिजनों का वियोग, रोग का भय और स्त्री के सुख की हानि होती है।।१९९।। क्षुधातुरो व्याधिनिपीडितः स्यादनेकधारातिभयार्दितश्च। कवौ यदा भोजनगे युवत्या महाधनो पण्डतमण्डितश्च।।१२०।। भोजन अवस्था में हो तो भूख से व्याकुल, रोग से पीडित और बारम्बार शत्रु से पीडित होता है।।१२०।। काव्यविद्यानवद्या च हृद्या मतिः सर्वदा नृत्यलिप्सागते भार्गवे। शङ्खवीणामृदङ्गादिगानध्वनिव्रातनैपुण्यमेतस्य वित्तोन्रतिः।।