बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कृपालु और ईश्वरभक्त होता है॥१२७॥ महाधनी नन्दननन्दितः स्यादपायकारी रिपुभूमिहारी। गमे शनौ पण्डितराजभावं धरापतेरायतने प्रयाति॥१२८॥ गमन अवस्था में हो तो महाधनी, पुत्र से युक्त, खर्चीला, शत्रु की भूमि को लेने वाला, राजा का पंडित होता है॥१२८॥ आगमने पदगर्दभयुक्तः पुत्रकलत्रसुखेन विमुक्तः। भानुसुते भ्रमते भुवि नित्यं दीनमना विजनाश्रयभावम्॥१२९॥ आगमन अवस्था में हो तो स्थान का भय, रोगभय, पुत्र, स्त्री के सुख से रहित, दीन स्थिति में निरंतर घूमने वाला होता है॥१२९॥ रत्नावलीकाञ्चनमौक्तिकानां व्रातेन नित्यंव्रजति प्रमोदम्। सभागते भानुसुते नितान्तं नयेन पूर्णो मनुजो महौजाः॥१३०॥ सभा अवस्था में हो तो रत्न-सुवर्ण-मुक्ता के समूह से नित्य आनंदित, नीतियुक्त, महातेजस्वी होता है॥१३०॥ आगमे गदसमागमो नृणामब्जबन्धुतनये यदा तदा। मन्दमेव गमनं धरापतेर्याचनाविरहिता मतिः सदा॥१३१॥ आगमन अवस्था में हो तो रोग युक्त, मंदगति और राजा से लाभ पाने की बुद्धि से हीन होता है॥१३१॥ सङ्गते जनुषि भानुनन्दने भोजनं भवति भोजनं रसैः। संयुक्तं नयनमन्दतानना मोहतापपरितापिता मतिः॥१३२॥ भोजन अवस्था में हो तो सरस भोजन का लाभ, नेत्रज्योति मन्द और माया-मोह से मन्द बुद्धि वाला होता है॥१३२॥ नृत्यलिप्सागते मन्दे धर्मात्मा वित्तपूरितः। राजपूज्यो नरो धीरो महावीरो रणाङ्गणे॥१३३॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हों तो धर्मात्मा, धन से पूर्ण, राजा से पूज्य, धीर, महावीर होता है॥१३३॥ भवति कौतुकभावमुपागते रविसुते वसुधावसुपूरितः। अतिसुखी सुमुखी सुखपूरितः कवितयामलया कलया नरः॥ कौतुक अवस्था में हों तो भूमि, धन से पूर्ण, अत्यंत सुखी, स्त्रीसुख से पूर्ण और कविता करने वाला होता है।।१३४।। निद्रागते वासरनाथपुत्रे धनी सदा चारुगुणैरुपेतः।