भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५७ केतु शयनावस्था में मेष, वृष, मिथुन वा कन्या राशि में हो तो जातक धनी होता है। अन्य राशि में हो तो रोग की वृद्धि होती है॥१४८॥ उपवेशं गते केतौ दद्रुरोगविवर्धनम्। अरिवातन्नृपव्यालचौरशङ्का समन्ततः॥१४९॥ उपवेशनावस्था में हो तो दादरोग की वृद्धि, शत्रु-वायु-राज-सर्प-चोर का भय होता है॥१४९॥ नेत्रपाणिं गते केतौ नेत्ररोगः प्रजायते। दुष्टसर्पादिभीतिश्च रिपुराजकुलादपि॥१५०॥ नेत्रपाणि अवस्था में हो तो नेत्र-रोग, दुष्ट सर्प आदि का भय, शत्रु तथा राजकुल से भी भय होता है॥१५०॥ केतौ प्रकाशने संज्ञे धनवान्धार्मिकः सदा। नित्यं प्रवासी चोत्साही सात्त्विको राजसेवकः॥१५१॥ प्रकाश अवस्था में हो तो धनी, धार्मिक, नित्य परदेशी, उत्साही, सात्त्विक और राजसेवक होता है॥१५१॥ गमेच्छायां भवेत्केतुर्बहुपुत्रो महाधनः। पण्डितो गुणवान्दाता जायते च नरोत्तमः॥१५२॥ गमन अवस्था में हो तो महाधनी, पंडित, गुणी, दाता होता है॥१५२॥ आगमे च यदा केतुर्नानारोगो धनक्षयः। दन्तघाती महारोगी पिशुनः परनिन्दकः॥१५३॥ आगमन अवस्था में हो तो अनेक रोग होते हैं, धन का नाश, दंतरोग, महारोग, कृपण, दूसरे की निंदा करने वाला होता है॥१५३॥ सभावस्थां गते केतौ वाचालो बहुगर्वितः। कृपणो लम्पटश्चैव धूर्त्तविद्याविशारदः॥१५४॥ सभावस्था में हो तो वाचाल, गर्वीला, कृपण, लम्पट और धूर्त्तविद्या का पंडित होता है॥१५४॥ यदागमे भवेत्केतुः केतुः स्यात्पापकर्मणाम्। बन्धुवादरतो दुष्टो रिपुरोगनिपीडितः॥१५५॥ आगम अवस्था में केतु हो तो पापकर्म करनेवालों में श्रेष्ठ, बंधुओं से विवादरत, दुष्ट और शत्रु तथा रोग से पीडित होता है॥१५५॥