बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भोजने तु जनो नित्यं क्षुधया परिपीडितः। दरिद्रो रोगसन्तप्तः केतौ भ्रमति मेदिनीम्॥१५६॥ भोजन अवस्था में हो तो भूख से पीडित, दरिद्र, रोग से संतप्त होकर घूमता है॥१५६॥ नृत्यलिप्सामते केतौ व्याधिना विकलो भवेत्। बुद्बुदाक्षो दुराधर्षो धूर्तोऽनर्थकरो नरः॥१५७॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो व्याधि से विकल, चकाचौंध नेत्रवाला, किसी के वश में न होने वाला, धूर्त और अनर्थकारी होता है॥१५७॥ कौतुकी कौतुके केतौ नटवामारतिप्रियः। स्थानभ्रष्टो दुराचारी दरिद्रो भ्रमते महीम्॥१५८॥ कौतुक अवस्था में हो तो वेश्या आदि से प्रेम करने वाला, स्थान- भ्रष्ट, दुराचारी और दरिद्र होता है॥१५८॥ निद्रावस्थां गते केतौ धनधान्यसुखं महत्। नानागुणविनोदेन कालो गच्छति जन्मिनाम्॥१५९॥ निद्रा अवस्था में हो तो धन-धान्य का बड़ा सुख होता है। अनेक गुणों की चर्चा में समय व्यतीत करने वाला होता है॥१५९॥ अथ ग्रहावस्थानुसारेण भावफलम्– शयने येषु भावेषु यस्य तिष्ठन्ति सद्ग्रहाः। नित्यं तस्य शुभंज्ञानं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥१६०॥ जन्म समय शयन अवस्था में स्थित शुभ ग्रह जिन-जिन भावों में होता है तो उन-उन भावों के फलों को शुभकारक होता है॥१६०॥ भोजने येषु भावेषु पापास्तिष्ठन्ति सर्वथा। तदा सर्वविनाशोऽपि नात्र कार्या विचारणा॥१६१॥ एवं भोजन अवस्था में गया हुआ पापग्रह जिन भावों में होता है उनके फलों का नाश करता है॥१६१॥ निद्रायां च यदा पापो जायास्थाने शुभं वदेत्। यदि पापग्रहैर्दृष्टो न शुभं च कदाचन॥१६२॥ यदि निद्रा अवस्था में पापग्रह सातवें भाव में हो तो शुभ फल, यदि पापग्रह से दृष्ट हो तो अशुभ फल करता है॥१६३॥