बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहाणामवस्थाध्यायः २५९ सुतस्थाने स्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा। तदा शुभं भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा॥१६३॥ पाँचवें भाव मे निद्रा या शयन अवस्था में पापग्रह हो तो शुभद नहीं होता है॥१६३॥ मृत्युस्थानस्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा। तदा तस्यापमृत्युः स्याद्राजतः परतस्तथा॥१६४॥ आठवें स्थान में पापग्रह निद्रा या शयन अवस्था में हो तो उसकी अपमृत्यु राजा के द्वारा या शत्रु के द्वारा होती है॥१६४॥ शुभग्रहैर्यदा युक्तः शुभैर्वा यदि वीक्षितः। तदा तु मरणं तस्य गङ्गायां च विशेषतः॥१६५॥ यदि पापग्रह शुभग्रहों से युक्त वा दृष्ट हो तो गंगा नदी में मृत्यु होती है॥१६५॥ कर्मस्थाने यदा पापः शयने भोजनेऽपि वा। तदा कर्मविपाकः स्यान्नानादुःखप्रदायकः॥१६६॥ कर्मभाव में पापग्रह शयन या भोजन अवस्था में हो तो कर्म से अनेक दुःख होते हैं॥१६६॥ दशमस्थो निशानाथो कौतुके च प्रकाशने। तदैव राजयोगः स्यान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥१६७॥ दशम स्थान में चन्द्रमा कौतुक या प्रकाशन अवस्था में हो तो राजयोग होता है॥१६७॥ बलाबलविचारेण ज्ञायते च शुभाशुभम्। एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वभावेषु बुद्धिमान्॥१६८॥ ग्रहों के बल और निर्बलता को देखकर शुभ-अशुभ फलों को बुद्धिमान् को जानना चाहिए।॥१६८॥ इति ग्रहाणामवस्थाध्यायः॥