बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दायाध्यायः २७५ शेष स्पष्टायु होती है, शेष स्पष्ट है॥४२॥ तत्र विशेषः- अथ योगत्रये विप्र शनियोगं करोति चेत्। एकएकादशहासः कक्ष्याहासस्त्वयं क्रमात्॥४३॥ हे विप्र ! तीनों प्रकार के आयु के योगों में यदि शनि योग करता हो तो क्रम से कक्ष्या का ह्रास होता है॥४३॥ ततः फलविशेषार्थं गुणदोषौ वदाम्यहम्। गुणैः प्रपूरितः सौरिः कक्ष्यावृद्धिं करोति च॥४४॥ अतः उसके गुण-दोष को कह रहा हूँ। गुणों से युक्त शनि कक्ष्या वृद्धि को करता है॥४४॥ दोषयुक्ता भवेद्धानिस्ताभ्यां निर्णय उच्यते। अत्यल्पायुर्भवेदल्पमल्पान्मध्यं प्रजायते॥४५॥ यदि दोषयुक्त हो तो कक्ष्या की हानि करता है अर्थात् अत्यंत अल्पायु हो तो मध्यायु॥४५॥ मध्यमाज्जायते दीर्घं कक्ष्यावृद्धेश्च लक्षणम्। एवं नीचारिगः सौरिः पापदृष्टिसमन्वितः॥४६॥ मध्यायु हो तों दीर्घायु करता है। इसी प्रकार शनि अपनी नीच राशि, शत्रु की राशि में पापग्रह से दृष्ट और युत हो तो॥४६॥ कक्ष्याह्रासकृतों विप्र त्रिभागेनायुहानिकृत्। दीर्घाद्भवति मध्यायुर्मध्यादल्पायुरेव च॥४७॥ कक्ष्या की हानि करता है। अर्थात् दीर्घायु हो तो मध्यायु, मध्यायु हो तो अल्पायु॥४७॥ अल्पादत्यल्पकं याति बाल्ये निधनसम्भवः। लग्नेशे वापि होरेशे केवलं शनिसंयुते॥४८॥ और अल्पायु हो तो अत्यल्पायु होता है तथा बाल्यकाल में ही मरण हो जाता है। लग्नेश वा होरेश केवल शनि से युत हो॥४८॥ पापर्क्षे पापयुक्ते वा पापदृष्टिसमन्विते। कक्ष्याह्रासं न कुर्वीत विना नीचारिगे द्विज॥४९॥ पापग्रह की राशि में वा पापयुक्त हो, पापग्रह से देखा जाता हो, यदि नीच राशि या शत्रु की राशि में न हो तो कक्ष्या का ह्रास नहीं करता है॥४९॥