बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् एवं तुङ्गादिरहितः कक्ष्यावृद्धिं न कारयेत्। शुभर्क्षे शुभसंयुक्ते शुभदृष्टौ च तुङ्गगे।।५०।। इसी प्रकार उच्चादि से रहित हो तो कक्ष्यावृद्धि को नहीं करता है। यदि शनि शुभ ग्रह की राशि में शुभ ग्रह से युक्त और शुभ ग्रह से दृष्ट होकर अपने उच्च में हो।।५०।। पापयोगेन रहिते कक्ष्यावृद्धिकरः शनिः। एवं नीचादिदोषेण कक्ष्याह्रासः प्रजायते।।५१।। और पापग्रह के योग से रहित हो तो कक्ष्या की वृद्धि करता है। इसी प्रकार नीचादि दोष के कारण कक्ष्या का ह्रास होता है।।५१।। गुरुणा स्थानसम्बन्धेऽप्येवं वृद्धिर्भविष्यति। लग्ने वा सप्तमे वापि तुङ्गादिगुणसंयुते।।५२।। इसी प्रकार गुरु भी स्थान संबंध से आयु में वृद्धि करता है। यदि गुरु लग्न में वा सप्तम में उच्चादि गुणों से युक्त हो।।५२।। शुभर्क्षे शुभदृग्युक्ते कक्ष्यावृद्धिकरो गुरुः। जीवने संशयो यस्य अल्पायुर्वृद्धिकारकम्।।५३।। शुभ राशि में शुभ ग्रह से दृष्ट और युक्त हो तो कक्ष्या की वृद्धि करता है।।५३।। अल्पायुषि च मध्यायुर्मध्याप्ते दीर्घमायुषि। एवं भेदानुभेदेन कथयामि तवाग्रतः।।५४।। अल्पायु हो तो मध्यायु, मध्यायु हो तो दीर्घायु को करता है। इस प्रकार भेदानुभेद से मैंने ह्रास-वृद्धि तुमसे कहा।।५४।। अथ अमितायुर्योगः— गुरुचन्द्रौ च कर्काङ्गे बुधशुक्रौ च केन्द्रगौ। शेषे लाभत्रिषष्ठस्थश्चेदमितायुस्तदा भवेत्।।५५।। जन्मलग्न कर्क हो, उसमें गुरु चन्द्रमा हों, बुध-शुक्र केन्द्र में हों और शेष ग्रह ११।३।६ भाव में हों तो अमित आयु होती है।।५५।। अथ मुनितुल्यायुर्योगः— देवलोकांशके मन्दे भौमे पारावतांशके। गुरौ सिंहासने लग्ने जातो मुनिसमो भवेत्।।५६।।