बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ : बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तदभावेऽष्टमेशस्य दशायां निधनं पुनः। मन्दश्चेत्पापसंयुक्तो मारकग्रहयोगतः।।१४।। इसके अभाव में अष्टमेश की दशा में मृत्यु होती है। शनि पापग्रह से युक्त हो और मारकेश के साथ योग करता हो तो।।१४।। तिरस्कृत्य ग्रहान्सर्वान्निहन्ता पापकृच्छनिः। मारकग्रहसम्बन्धी पापकत्र्ता शनिस्तदा। तिरस्कृत्य ग्रहान्सर्वान्निहन्ता भवति ध्रुवम्।।१५।। सभी ग्रहों को छोड़कर वही मारक हो जाता है।।१५।। एतद्दशान्तर्भुक्त्यादौ विचार्य्यैव मृतिं वदेत्। षष्ठद्रेष्काणपश्चैव तथा वैनाशिकाधिपः।।१६।। छठे द्रेष्काण (लग्न से २२वें द्रेष्काण) का स्वामी और २३वें नक्षत्र का स्वामी।।१६।। विपत्ताराप्रत्यरीशौ वधमेशस्तथैव च। आद्यन्तपौ च विज्ञेयौ चन्द्राक्रान्तगृहात्तथा।।१७।। विपत्तारा, प्रत्यरितारा, वधतारां का स्वामी, चन्द्र राशि से द्वितीय, द्वादश के स्वामी।।१७।। दशाक्षिप्तेषु कालेषु मारकौ मरणप्रदः। दुष्टतारापतेः पाके निर्याणं कथितं बुधैः।।१८।। अपनी-अपनी दशाकाल मे मारक होते हैं अथवा पूर्वोक्त दुष्ट ताराओं के स्वामी की दशा में मृत्यु होती है।।१८।। मारकग्रहाश्रितो राशिर्मारकस्वामिनोऽथवा। ताभ्यां महादशाकाले विंशोत्तर्य्याः स्थिरादिकः।।१९।। मारकेश के आश्रित राशि वा मारकेश जिस भाव में बैठा हो, उस राशि की महादशा में पापग्रह के अंतर में विंशोत्तरी के अनुसार मृत्यु होती है।।१९।। पापे मृत्युर्विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम। मारका बहवः खेटा यदि वीर्यसमन्विताः।।२०।। यदि बलवान् बहुत से ग्रह हों तो सबसे बली होता है।।२०।। तत्तद्दशान्तरे विप्ररोगकष्टादिसम्भवः। षष्ठाधिपदशायां च निधनं भवति ध्रुवम्।।२१।।