भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 800 में से

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·अथ मारकभेदाध्यायः ३१७ वही मारक होता है, किन्तु उन लोगों की दशा-अन्तर के समय कष्टादि होता है तथा षष्ठेश की दशा में मृत्यु होती है।।२१।। न्यूनातिरिक्तभेदेन बहुखेटास्तु मारकाः। दुर्बलाश्रयराशीशदशास्वल्पार्तिदा भवेत्।।२२।। न्यूनातिरिक्त अधिक मारक हों तो दुर्बल राशीश की दशा में अल्प कष्ट होता है।।२२।। प्रबलस्य दशायां च महारोगार्त्तिमृत्युवत्। भयशोकमृताद्भीतिस्तस्कराग्निभयं भवेत्।।२३।। मारकस्य दशायां च महत्या निधनाश्रयी। भूतामन्तर्दशामाह तवाग्रे कथयामि भोः।।२४।। प्रबल की दशा में महारोग से कष्ट और मृत्यु होती है और भय, शोक, मृत्युभय, चोरभय तथा अग्निभय होता है।।२४।। मारकग्रहाश्रयीभूतमहापाके विचिन्तयेत्। कारकाच्च विलग्नाद्वा सप्तमाद्वा द्वितीयकम् ।।२५।। मारकेश के आश्रित राशि की दशा-अंतर्दशा काल में उपरोक्त सभी बातों का विचार करना चाहिए। कारक से अथवा लग्न से सप्तम से दूसरे।।२५।। षष्ठाष्टरिःफनाथान्तमपहाराष्टके · मृतिः। तेषामन्तर्दशाधीशास्तेषां मध्ये बलाढ्यकः।।२६।। तदीयान्तर्दशाकाले निधनं भवति ध्रुवम्। अपरा पापकाले तु रोगदुःखार्त्तिवान्द्विज।।२७।। छठे, आठवें, बारहवें इन आठों के स्वामियों की दशादि में मृत्यु कहना चाहिए। इनमें भी बलवान् अंतर्दशेश के समय में मृत्यु होती है और अन्य लोगों की अंतर्दशा आदि में रोग-दुःख आदि होता है।।२७।। · इति मारकभेदाध्यायः। · अथाष्टकवर्गाध्यायः ज्ञात्वादौ करणस्थानं विन्दुरेखे च वर्गणाम्। क्रमादष्टकवर्गस्य पृथक्कृत्य फलं वदेत्।।१।। पहले भाव और ग्रहों के करण (शून्य) स्थान (रेखा) अर्थात् बिन्दु और रेखाओं का भलीभाँति ज्ञान करके तब अष्टकवर्ग के फल को-