भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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अथाष्टवर्गाध्यायः ३२१ अथ गुर्वष्टकवर्गचक्रम्—

बृ.शु.श.सू.चं.मं.बु.ल.
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अथ शुक्राष्टकवर्गः—
चन्द्रो व्यस्तारिखेषु व्यरिमदननभोऽन्त्येषु लग्नात्प्रशस्तो।
व्यन्तास्तारातिषु स्वाद्व्ययनिधनभवेष्वर्कतो दैत्यमन्त्री।।
धीधर्माष्टाप्तिबन्धुत्रिदशसु रविजाद्धीतपःस्वाष्टलाभे।
जीवात् ज्ञाद्धीत्रिलाभक्षतनवसुकुजाद्धीभवापोक्लिनेषु।।७।।
शुक्र चंद्रमा से ७,६,१० स्थानों को छोड़कर शेष
१,२,३,४,५,८,९,१०,११,१२ स्थानों में शुभफल देता है। लग्न से
६,७,१०,१२ को छोड़कर शेष स्थानों में, अपने स्थान से १२,६,७, को
छोड़कर शेष स्थानों में, सूर्य से १२,८,११ स्थानों में, शनि से
५,९,८,११,४,३,१० स्थानों में, गुरु से ५,९,२,८,११, स्थानों में, बुध
से ५,३,११,६,१ स्थानों में और भौम से ५,११,३,६,९,१२ स्थानों में शुभफल
देता है।।७।।
अथ शुक्राष्टकवर्गचक्रम्—
शु.श.सू.चं.मं.बु.बृ.ल.
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