बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
पृष्ठ 319, कुल 800 में से
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अथाष्टवर्गाध्यायः ३२१ अथ गुर्वष्टकवर्गचक्रम्—
| बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | १ | २ | १ | १ | १ |
| २ | ५ | ५ | २ | ५ | २ | २ | २ |
| ३ | ६ | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ |
| ४ | ९ | १२ | ५ | ९ | ७ | ५ | ५ |
| ७ | १० | ७ | ११ | ८ | ६ | ६ | |
| ८ | ११ | ८ | १० | ९ | ७ | ||
| १० | ९ | १२ | १० | ९ | |||
| ११ | १० | ११ | १० | ||||
| ११ | ११ | ||||||
| अथ शुक्राष्टकवर्गः— | |||||||
| चन्द्रो व्यस्तारिखेषु व्यरिमदननभोऽन्त्येषु लग्नात्प्रशस्तो। | |||||||
| व्यन्तास्तारातिषु स्वाद्व्ययनिधनभवेष्वर्कतो दैत्यमन्त्री।। | |||||||
| धीधर्माष्टाप्तिबन्धुत्रिदशसु रविजाद्धीतपःस्वाष्टलाभे। | |||||||
| जीवात् ज्ञाद्धीत्रिलाभक्षतनवसुकुजाद्धीभवापोक्लिनेषु।।७।। | |||||||
| शुक्र चंद्रमा से ७,६,१० स्थानों को छोड़कर शेष | |||||||
| १,२,३,४,५,८,९,१०,११,१२ स्थानों में शुभफल देता है। लग्न से | |||||||
| ६,७,१०,१२ को छोड़कर शेष स्थानों में, अपने स्थान से १२,६,७, को | |||||||
| छोड़कर शेष स्थानों में, सूर्य से १२,८,११ स्थानों में, शनि से | |||||||
| ५,९,८,११,४,३,१० स्थानों में, गुरु से ५,९,२,८,११, स्थानों में, बुध | |||||||
| से ५,३,११,६,१ स्थानों में और भौम से ५,११,३,६,९,१२ स्थानों में शुभफल | |||||||
| देता है।।७।। | |||||||
| अथ शुक्राष्टकवर्गचक्रम्— | |||||||
| शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. |
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| १ | ३ | ८ | १ | ३ | ३ | ५ | १ |
| २ | ४ | ११ | २ | ५ | ५ | ८ | २ |
| ३ | ५ | १२ | ३ | ६ | ६ | ९ | ३ |
| ४ | ८ | ४ | ९ | ९ | १० | ४ | |
| ५ | ९ | ५ | ११ | ११ | ११ | ५ | |
| ८ | १० | ८ | १२ | ८ | |||
| ९ | ११ | ९ | ९ | ||||
| १० | ११ | ११ | |||||
| ११ | १२ |