बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टवर्गाध्यायः ३२७ शन्यष्टकवर्गः ३९ लग्नाष्टकवर्गः ४९
[शन्यष्टकवर्गः ३९]
८ (।।।। श.) | ९ (।।) | १० (।।।।।।) | ११ (। मं.) | १२ (।।।) | १ (।।।।।।।) | २ (।।।) | ३ (।।।। चं. श.) | ४ (।।।। सू.) | ५ (।। बृ. बु.) | ६ (।) | ७ (।।)
[लग्नाष्टकवर्गः ४९]
११ (।।।।। मं.) | १२ (।।।) | १ (।।।।।।) | २ (।।। बृ.) | ३ (स ४ । १४) | ४ (। सू.) | ५ (।।।।।। बु.) | ६ (।।।।।) | ७ (।।।) | ८ (।।।।। श.) | ९ (।।।) | १० (।।।।।।)
अथैकाधिपत्यशोधनम्— एवं त्रिकोणं संशोध्य पश्चादेकाधिपत्यता। क्षेत्रद्वये फलानि स्युस्तदा संशोषयेद्बुधः ।।१२।। इस प्रकार त्रिकोण शोधन के बाद एकाधिपत्य शोधन करे। एक ग्रह की दो राशियों में त्रिकोण-शोधन के फलों से एकाधिपत्य शोधन होता है ।।१२।। क्षीणेन सह चान्यस्मिञ्छोधयेद्ग्रहवर्जिते। ग्रहयुक्ते फले हीने ग्रहाभावे फलाधिके ।।१३।। अनेन सह चान्यस्मिञ्छोधयेद्ग्रहवर्जिते। फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् ।।१४।। उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यः कदाचन। उभयोर्ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् ।।१५।। सग्रहा ग्रहतुल्यत्वात्सर्वं संशोध्यमग्रहात्। एकत्र नास्ति चेत् सर्वहानिरन्यत्र कीर्त्तिता। कुलीरसिंहयो राश्योः पृथक् क्षेत्रं पृथक् फलम् ।।१६।। यदि एक ग्रह की दोनों राशियों में कोई ग्रह न हो तो अल्प संख्या को अधिक संख्या में घटाकर शेष को अधिक संख्या के नीचे रख दे और अल्पसंख्या को ज्यों का त्यों रख दे (१)। यदि एक राशि में ग्रह हो और दूसरी राशि में ग्रह न हो और जिस राशि में ग्रह हो उसकी संख्या ग्रहहीन राशि की संख्या से अल्प हो तो ग्रहहीन राशि की संख्या में अल्प संख्या को घटाकर शेष ग्रहहीन के नीचे रख दे और अल्प संख्या यथावत्