बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् धनेश पूर्णबली होकर पाँचवें भाव में हो, गुरु वैशेषिकांश में हो तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९४॥ लग्नपुत्राधिपौ स्वोच्चे अन्योऽन्यं चापि वीक्षितौ। परस्परस्थानगतौ पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९५॥ लग्नेश और पंचमेश अपनी उच्चराशि में हों, परस्पर देखते हों और परस्पर स्थान में हों तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९५॥ पुत्रस्थानाधिपस्यांशराशीशे शुभसंयुते। शुभेन वीक्षिते वापि पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९६॥ पंचमेश जिस नवांश में हो, उसका स्वामी शुभग्रह से युत हो वा शुभग्रह से दृष्ट हो तो अनेक संतान होती हैं॥१९६॥ लग्नपुत्राधिपौ केन्द्रे शुभग्रहसमन्वितौ। कुटुम्बेशे बलाढ्ये तु पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९७॥ लग्नेश और पंचमेश केन्द्र में शुभ ग्रह से युत हों, धनेश बलवान् हो तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९७॥ लग्नेशे दारभावस्थे दारेशे लग्नमाश्रिते। द्वितीयेशे बलाढ्ये तु पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९८॥ लग्नेश सातवें भाव में, सप्तमेश लग्न में हो और धनेश बली हो तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९८॥ दारेशग्रहसंयुक्तनवांशभवनाधिपे । पुत्रवित्तविलग्नेशैर्दृष्टे तु बहुपुत्रता॥१९९॥ दारेश से युत ग्रह का नवमांशेश पंचमेश, धनेश तथा लग्नेश से देखा जाता हो तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९९॥ इति बहुपुत्रयोगाः। अथानपत्ययोगः- पुत्रवित्तकलत्रेशसंयुक्तनवभागपाः । पापांशकाः पापयुता अनपत्यत्वमादिशेत्॥१२०॥ पंचम, धन, सप्तम के स्वामियों से युक्त नवमांशेश का नवांश पापग्रह का हो अथवा पापयुत हो तो अनपत्य योग होता है॥१२०॥ व्ययेशसंयुतांशेशे मृत्युराशौ स्थिते सति। पुत्रेशे क्रूरषष्ठ्यंशे अनपत्यत्वमादिशेत्॥१२१॥