भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३७१ लग्नेश से युत अंशेश आठवें भाव में हो और पंचमेश क्रूरग्रह से षष्ठ्यंश में हो तो अनपत्य योग होता है।।१२१।। गुरुलग्नेशदारेशपुत्रस्थानाधिपेषु च। सर्वेषु बलहीनेषु वक्तव्या त्वनपत्यता।।१२२।। गुरु, लग्नेश, सप्तमेश और पंचमेश निर्बल हों तो अनपत्य योग होता है।।१२२।। लग्नपुत्रेश्वरौ दुःस्थौ कारके नीचराशिगे। अनपत्यग्रहे पुत्रे अनपत्यत्वमादिशेत्।।१२३।। लग्नेश और पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हों, कारक नीच राशि में हो, कोई अनपत्यग्रह (पापग्रह) पाँचवें भाव में हो तो अनपत्य योग होता है।।१२३।। क्रूरषष्ठ्यंशके जीवे पुत्रस्थे नाशराशिपे। पुत्रेशे नाशराशिस्थे अनपत्यत्वमादिशेत्।।१२४।। गुरु क्रूरग्रह के षष्ठ्यंश में हो, पाँचवें भाव में अष्टमेश हो और पंचमेश आठवें भाव में हो तो अनपत्य योग होता है।।१२४।। इत्यनपत्ययोगाः। अथ चिरकालात्पुत्रप्राप्तियोगः- लग्नाधिपे कुजे स्वोच्चे रन्ध्रे मन्दयुते रवौ। शुभदृष्टिसमायोगे चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२५।। लग्नेश भौम अपनी उच्चराशि में, आठवें भाव में शनि से युत रवि हो और शुभग्रह से देखा जाता हो तो अधिक दिन में संतान होती है।।१२५।। लग्ने मन्दे गुरौ रन्ध्रे व्यये भौमसमन्विते। शुभदृष्टे स्वतुङ्गे वा चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२६।। लग्न भाव में शनि, गुरु आठवें भाव में, बारहवें भाव में भौम हो वा शुभदृष्ट अपने उच्च में हो तो बहुत दिनों में संतान होती है।।१२६।। पुत्रस्था मन्दजीवज्ञा लग्ने पुत्राधिपे शुभे। पुत्रेशे शुभराशिस्थे चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२७।। संतान भाव में शनि, गुरु और बुध हों, पंचमेश शुभग्रह हो, पंचमेश शुभग्रह की राशि में हो तो अधिक समय में संतान होती है।।१२७।।