बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यावत्संख्या भवेद्राशिस्तावद्वारं विनिर्दिशेत्। शिवविष्णुस्थापनाद्वा लक्षजापात्सुखं भवेत्।।१४१।। पाँचवें भाव की राशिसंख्या के समान वार हरिवंश सुनना चाहिए। अथवा शिव-विष्णु की मूर्त्ति की स्थापना करे और लक्ष जप करावें तो अवश्य संतान का सुख होता है।।१४१।। इति पूर्वजन्मशापद्योतकोध्यायः। अथ दशाध्यायः अथ दशाभेदमाह- अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दशाभेदाननेकशः। विंशोत्तरी दशा चोक्ता षोडशोत्तरी तथैव च।।२।। पराशरजी बोले- मैं अनेक प्रकार के दशा के भेदों को कह रहा हूँ, उसे सुनो। विंशोत्तरी दशा, षोडशोत्तरी दशा।।२।। द्वादशोत्तरीका ज्ञेया तथैवाष्टोत्तरी दशा। पञ्चोत्तरी दशा तद्वद्दशा शतसमा स्मृता।।३।। द्वादशोत्तरी दशा, अष्टोत्तरी दशा, पंचोत्तरी दशा, शतसमा दशा।।३।। दशा हि चतुरशीतिः प्राह चाथ द्विसप्ततिः। तथा षष्टिसमा चोक्ता दशा षड्विंशतिः समा।।४।। चतुरशीतिसमा दशा, द्विसप्ततिसमा दशा, षष्टिसमा दशा, षड्विंशतिसमा दशा।।४।। नवमांशनवदशा राश्यंशकदशाः स्मृताः। दशा कालाभिधा चक्रदशा चक्र मुनीश्वरैः।।५।। नवमांशनव दशा, राश्यंशक दशा, काल दशा, कालचक्र दशा, चक्र दशा।।५।। चरपर्या दशा चाथ स्थिरदशा च द्विजोत्तम। अथोत्तरदशा विप्र ब्रह्मता चापरा दशा।।६।। चरपर्याय दशा, स्थिर दशा, उत्तर दशा, ब्रह्मग्रह दशा।।६।। केन्द्राद्या च दशा ज्ञेया कारकादि दशा मता। माण्डूकी च दशा प्रोक्ता तथा शूलदशापि च।।७।। केन्द्रादि दशा, कारकादि दशा, मांडूकी दशा, शूल दशा।।७।।