बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ३७५ योगार्धजा दशा विप्र दृग्दशां कथयाम्यहम्। दशा त्रिकोणनामा वै राशीनां च दशा तथा।।८।। योगार्धदशा, दृग्दशा, त्रिकोण दशा, राशि दशा।।८।। तारा दशा तथा ज्ञेया दशा रोगा च वर्णदा। पञ्चस्वरदशा विप्र योगिनी च दशा स्मृता।।९।। तारा दशा, वर्णद दशा, पंचस्वर दशा, योगिनी दशा।।९।। ततः पैण्ड्यदशा ज्ञेया तथांशकदशा द्विज। नैसर्गिकदशा विप्र अष्टवर्गदशा स्मृता।।१०।। पिंड दशा, अंश दशा, नैसर्गिक दशा, अष्टवर्ग दशा।।१०।। सन्ध्या दशा च ज्ञातव्या पाचका च दशा द्विज। द्विचत्वारिंशद्भेदाः स्युः कथयामि तवाग्रतः।।११।। सन्ध्या दशा और पाचक दशा— इस प्रकार ४२ प्रकार की दशा होती है।।११।। अथ विंशोत्तरीदशामाह— आनयनप्रकारं च शृणुष्व द्विजपुङ्गव। नामनक्षत्रपर्यन्तमार्क्षादि कृत्तिकादितः।।१२।। हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके आनयन प्रकार को कह रहा हूँ। कृत्तिका से राशिनाम पर्यन्त ही गिनना चाहिए।।१२।। सैषा कृष्णेऽर्कहोरायां चन्द्रहोरागते सिते। दहनात्स्वर्क्षपर्यन्तं गणयेन्नवभिर्हरेत्।।१३।। कृष्णपक्ष में रवि के होरा में और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की होरा में कृत्तिका से कृत्तिका नक्षत्र से अपने जन्मनक्षत्र तक गिन कर ९ से भाग देने पर शेष तुल्य।।१३।। सूर्येन्दुक्ष्माजतमसो वाक्पतिर्मन्दचन्द्रजा। केतुशुक्रौ क्रमादेते विज्ञेयाश्च दशाधिपाः।।१४।। क्रम से सूर्य, चन्द्र, भौम, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र की दशा होती है।।१४।। रसाशामुनिधृत्यब्दा भूपविधृतिवत्सराः। सप्तेन्दवो नगा व्योमबाहवो क्रमतो मताः।।१५।।