बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् और क्रम से ६,१०,७,१८,१६,१९,१७,७,२० वर्ष इन की दशा के वर्ष होते हैं॥१५॥ अथ दशायाः भुक्तभोग्यानयनम्— दशामानं भयातघ्नं भभोगेनोद्धृतं फलम्। भुक्तवर्षादिकं ज्ञेयं दशावर्षाच्च संशोध्यम्। शेषं वर्षादिकं भोग्यं दशायाः भवति ध्रुवम्॥१६॥ जिस ग्रह की दशा में जन्म हो, उसके वर्षमान से भयात को गुणाकर गुणन फल में भभोग से भाग देने से लब्धि वर्ष- मास- दिन- घटी- पल भुक्त दशा होती है। इसे दशा के सम्पूर्ण वर्ष में घटा देने से भाग्यदशा शेष होती है॥१६॥ स्फुटतरो हि मगुः कलिकात्मकः खखगजैर्विभजेद्गत ऋक्षकम्। तदुडुवर्षगुणं च समादिकं खखगजैर्विभजेत्फलमत्र हि॥१७॥ अथवा स्पष्ट चन्द्रमा की कला बनाकर ८०० से भाग देने से लब्धि गत नक्षत्र होता है। उससे दशा का ज्ञान कर दशावर्ष से शेष को गुणा कर ८०० से भाग देने से मास आदि भुक्त होते हैं। उसे दशावर्ष में घटाने से शेष भोग्य वर्षादि होता है॥१७॥ अथ विंशोत्तरीदशाज्ञानार्थं चक्रम्—
| सू. | चं. | मं. | रा. | बृ. | श. | बु. | के. | शु. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | १० | ७ | १८ | १६ | १९ | १७ | ७ | २० | दशावर्षाणि |
| कृ. | रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | श्ले. | म. | पू.फा. | |
| उ.फा. | ह. | चि. | स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | नक्षत्राणि |
| उ.षा. | श्र. | ध. | शत. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | भ. | |
| उदाहरण— पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण का भयात १०।३२ भभोग | |||||||||
| ५५।५३ है। कृतिका से गिनने से गुरु की दशा में जन्म हुआ। गुरु | |||||||||
| के दशा वर्ष १६ से भयात के पल ६३२ को गुणाकर गुणनफल १०११२ | |||||||||
| में पलात्मक भभोग ३३५३ से भाग देने से लब्धि ३ वर्ष हुआ। | |||||||||
| शेष ५३ को १२ से गुणाकर गुणनफल ६३६ में भभोग का भाग देने से |