बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ३७७ लब्धि शून्य मास और शेष ६३६ को ३० से गुणाकर गुणनफल १९०८० में भभोग का भाग देने से लब्ध ५० दिन हुआ। शेष २३१५ को ६० से गुणाकर गुणनफल १३८९०० में भभोग का भाग देने से लब्धि ४१ घटी हुआ। शेष १४२७ को ६० से गुणाकर गुणनफल ८५६२० में भभोग से भाग देने से लब्धि २५ पल हुआ। इस प्रकार जन्म के पूर्व गुरु की दशा ३ वर्ष मास ५ दिन ४१ घटी और २५ पल भुक्त हो चुकी। इसे गुरु के दशावर्ष १६ में घटाने से भोग्य अर्थात् शेष दशावर्ष १२, मास ११, दिन २४, घटी १८ और ३५ पल भोग्य था। विंशोत्तरीदशाचक्रम्— | बृ. | श. | बु. | के. | शु. | सू. | चं. | मं. | रा. | ग्रहाः | | १२ | १९ | १७ | ७ | २० | ६ | १० | ७ | १८ | वर्ष | | ११ | | | | | | | | | मा. | | २४ | | | | | | | | | दि. | | १८ | | | | | | | | | घ. | | ३५ | | | | | | | | | प. | | २०१३ | २०२६ | २०४५ | २०६२ | २०६९ | २०८९ | २०९५ | २१०५ | २११२ | २१३० | | ३ | ३ | ३ | | | | | | | | | १८ | १२ | १२ | | | | | | | | | २६ | ४४ | ४४ | | | | | | | | | १४ | ४९ | ४९ | | | | | | | | इति विंशोत्तरीदशाक्रमः। अथ षोडशोत्तरीदशाक्रम— एकोपचयते रुद्राद्धृत्यन्तं वत्सराः क्रमात्। रविर्भौमो गुरुर्मन्दः केतुश्चन्द्रो बुधो भृगुः॥१९८॥ ११ में एक-एक १८ तक जोड़ने से दशावर्ष ११।१२।१३।१४।१५।१६।१७।१८ क्रम से सूर्य, भौम, गुरु, शनि, केतु, चन्द्रमा, बुध और शुक्र का होता है॥१९८॥ अष्टौ दशाधिपाः प्रोक्ता राहुहीना नवग्रहाः। पुष्यभाज्जन्मभं यावद्गणयेद्वसुभिर्हरेत् ॥१९९॥ राहु को छोड़कर नवग्रह में आठ ही ग्रह दशेश होते हैं। पुष्य से जन्म- नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या हो उसमें ८ से भाग देने पर शेषांक तुल्य सूर्य आदि की दशा होती है॥१९९॥