भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 800 में से

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पृष्ठ 383

अथ दशाध्यायः ३८५ अथ कालदशामाह- सन्ध्या पञ्चघटी प्रोक्ता दिनषष्ट्यंशनाडिका। सूर्यबिम्बांदधः पूर्वं परस्तादुदयादपि ।।४३।। दिन-रात्रि का मान ६० घटी होता है, इसका चार विभाग किया गया, सूर्य के बिम्ब के आधा उदय के पहले ५ घटी और बाद में ५ घटी; यों दोनों मिलाकर १० घटी की प्रातः सन्ध्या एवं अर्धास्त सूर्यबिम्ब के पूर्व ५ घटी तथा इसके पश्चात् ५ घटी अर्थात् १० घटी की सायं सन्ध्या होती है।।४३।। सन्ध्याद्वयं विंशत्याघटिकाभिः प्रकीर्त्तितम्। दिनस्य विंशतिर्घट्यः पूर्णसंज्ञा उदाहृता।।४४।। इस प्रकार से दोनों संध्यायें २० घटी की होती हैं। शेष दिन के २० घटी की पूर्ण संज्ञा।।४४।। निशायाम्मुग्धसंज्ञाश्च घटिका विंशतिश्च याः।।४५।। सूर्योदयस्य या सन्ध्या खण्डाख्या दशनाडिकाः।।४५।। और इसी प्रकार रात्रि के २० घटी की मुग्धा संज्ञा होती है। सूर्योदय के सन्ध्या की खण्ड संज्ञा।।४५।। अस्तकालस्य या सन्ध्या सुधाख्या दशनाडिकाः। पूर्णमुग्धे गतघटीषड्गुणे नवधा लिखेत्।।४६।। और सायंकाल की संध्या को सुधा कहा है। यदि पूर्णा या मुग्धा में जन्म हो तो दोनों के गतघटी को ६ से गुणा कर एकत्र रख दें।।४६।। तथा खण्डसुधासूर्ये हते तु नवधा लिखेत्। विभक्तानीन्द्रिययुगैर्मानख्यानफलानि च।।४७।। यदि खंड या सुधा में जन्म हो तो १२ से गुणाकर एकत्र रखकर दोनों जगह ४५ से भाग देने से जो फल आवे उसें नव जगह रखकर।।४७।। क्रमात्सूर्यादिकानां च मानमुक्तं मुनीश्वरैः। स्वस्वमानं स्वसंख्याभिर्गुणिते स्युः समादयः।।४८।। सूर्यादि ग्रहों की संख्या १,२ आदि से गुणा कर देने से उनके दशावर्षादि होते हैं।।४८।। उदाहरण- जैसे किसी का दिन इष्टकाल २।२६- है, इसमें से सूर्योदय के संध्यामान घटी में घटा देने से शेष ७।४४ बचा, अतः खण्ड