बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ३८७ मतान्तर से चक्रदशा- चक्राख्याथ दशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन। लग्नस्थस्य दशा चादौ ततो वित्तस्थितादयः।।१।। यह दशा दो प्रकार की होती है। प्रथम भावस्थ ग्रह की और दूसरी भावों की। हे द्विजनंदन ! मैं तुमसे चक्रदशा को कहता हूँ। पहले जन्मलग्न में बैठे ग्रह की, उसके बाद धन आदि भावों में बैठे हुए ग्रहों की दशा होती है।।१।। द्वित्र्यादयो यदैकस्था तदा भागादयोऽधिकात्। तत्रापि तुल्ये नैसर्गाद्बलात्सर्वाधिकस्य च।।२।। यदि एक ही भाव में दो या तीन ग्रह हों तो उनमें जिसका अधिक अंश हो उसका पहले, इसके बाद उससे न्यूनांश की दशा होती है। यदि अंशादि भी समान हों तो नैसर्गिक बल जिसका अधिक हो उसी की पहले दशा होगी।।२।। राशिप्रमितवर्षाणि भागाह्नश्चानुपातः। भावानामपि लग्नाच्च वर्षाणि दिङ्मितानि च।।३।। जिस भाव में ग्रह है उस भाव की राशि से संख्या तुल्य वर्ष प्रमाण दशा वर्ष और अंश से अनुपात द्वारा मासादि लेना चाहिए। भावों की दशा जन्मलग्न से आरम्भ कर प्रत्येक भावों की दशा होती है। इनका दशा वर्ष प्रत्येक भाव का दश-दश वर्ष का होता है।।३।। भुक्ता दशाऽनुयाताद्वा विज्ञेया स्वस्वकल्पनात्। अन्तर्दशापि सुधिया सूक्ष्मादेशाय चिन्तयेत्।।४।। दशा का भुक्त अनुपात द्वारा लाना चाहिए। इसी प्रकार सूक्ष्म फल कहने के लिए अन्तर्दशा का भी साधन करना चाहिए।।४।। अथ कालचक्रदशामाह- वन्देऽहं गोपिकानाथं भारतीं गणनायकम्। पार्वत्यै कथिता पूर्वं कालचक्रं पिनाकिना।।५२।। श्रीकृष्ण, सरस्वती एवं गणेशजी को प्रणाम कर जो कि शंकरजी ने पार्वती से पूर्व में कालचक्र को कहा था।।५२।। तच्चक्रसारमुद्धृत्य लघुमार्गेण कथ्यते। शुभाशुभं मनुष्याणां भूतभव्यं च भावि तत्।।५३।। उसके तत्त्व को लेकर लाघव से मैं कालचक्र को कह रहा हूँ, जो