भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

३८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् मनुष्यों के भूत, वर्तमान और भविष्य के शुभ-अशुभ को बताने वाला है।।५३।। द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्ध्वं समानकम्। गृहा द्वादश जायन्ते सव्यचक्रे यथाक्रमम् ।।५४।। खड़ी और आड़ी रेखाओं से १२ कोष्ठ का चक्र बना के।।५४।। द्वितीयादिषु कोष्ठेषु राशीन्मेषादिकाँल्लिखेत्। एवं द्वादशराश्याख्यं कालचक्रमुदीरितम्।।५५।। उसके दूसरे आदि कोष्ठ में मेषादि राशियों को लिखे। उनके आगे कहे अनुसार नक्षत्रों का न्यास करे। इसी प्रकार एक दूसरा चक्र भी बनावे। दोनों में एक की सव्य और दूसरे की अपसव्य कल्पना कर आगे कहे हुए रीति के अनुसार राशि तथा नक्षत्रों का न्यासं करे। इसी को १२ राशि का कालचक्र कहते हैं।।५५।। चक्रे नक्षत्रन्यासविधिः- अश्विन्यादित्रयं चैव सव्यमार्गे प्रतिष्ठितम्। रोहिण्यादि त्रयं चैव अपसव्ये यथाक्रमम् ।।५६।। अश्विनी से तीन नक्षत्रं सव्य चक्र में, रोहिणी से ३ नक्षत्र अपसव्य चक्र में।।५६।। अश्विन्यादितिहस्तर्क्षमूलवाताहिवह्नयः। विश्वर्क्षपूर्वाभाद्रं च रेवती सव्यतारकाः।।५७।। पुनर्वसु से ३-३ नक्षत्र सव्य-अपसव्य चक्र में लिखने से सव्य चक्र में अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, स्वाती, श्लेषा, कृत्तिका, उत्तराषाढ़, पूर्वाभाद्रपद और रेवती- ये १० नक्षत्र सव्य चक्र में हुए।।५७।। एतद्दशोडुपादानामश्विन्यादौ च वीक्षयेत्। विशदस्तत्प्रकारस्तु कथ्यते शृणु पार्वति।।५८।। इन नक्षत्रों के चरणों को अश्विनी के चरणों के समान ही देखना चाहिए। इसका विशद प्रकार आगे कह रहा हूँ।।५८।। देहजीवज्ञानप्रकारमाह- देहजीवौ मेषचापौ दस्रादाद्यचरणस्य च। मेषादि चापपर्यन्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।५९।। अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण मेष देह और धनराशि जीव संज्ञक होती है और मेष से धन पर्यन्त नव राशियाँ (मेष, वृष, मिथुन, कर्क,