बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें४१८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । उक्त घटी के अनुसार भयात के घटी के तुल्य जो खंड हो ।।८६।। लग्नाद्द्वादशराशीशमारभ्य द्विजसत्तम । क्रमव्युत्क्रमभेदेन द्वादशदशा मता ।।८७।। वहाँ तक लग्न से आरम्भ कर १२ राशियों के स्वामियों से आरम्भ कर क्रम उत्क्रम गणना से दशा होती है ।।८६।। अथवा- भभोगं रविभिर्भक्ते यल्लब्धं घटिकादिकम् । तेन भक्ते भयातंच यल्लब्धं भादिकं फलम् ।।८८।। भभोग को १२ से भाग देने से जो घट्यादि लब्धि हो उसमें भयात से भाग देने से जो राश्यादि फल मिले ।।८८।। तेनयुक्तं जन्मलग्नं तमारभ्य दशामितिः । स्थिरवच्चसमामानं क्रमोत्क्रम विभेदतः ।।८९।। उसमें जन्मलग्न को जोड़ देने से जो राश्यादि आवे वहीं से (विषम-सम) के अनुसार दशा का आरम्भ होता है। यहाँ दशा का वर्ष स्थिर दशा के समान ही लेना चाहिये ।।८९।। उदाहरण-पूर्वोक्त जन्म नक्षत्र पुनर्वसु का भभोग ५५।५३ है और भयात १०।३२ तथा जन्म लग्न ९।१५।३२।५१ है। भभोग ३३५३ में १२ से भाग देने से लब्ध घटिकादि २७९।२५ प्राप्त हुआ। इससे पलात्मक भयात ६३२ में भाग देने से लब्धि राश्यादि २।७।५१।२० हुआ इसमें जन्मलग्न को जोड़ देने से ११।२३।२४।११ हुआ अर्थात् मीन राशि से उत्क्रम गणना से दशा का आरम्भ हुआ। नक्षत्रदशाचक्रम् -
| मी. | कुं. | म. | ध. | वृ. | तु. | कं. | सिं. | क. | मि. | वृ. | मे. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ८ | ७ | ९ | ८ | ७ | ९ | ८ | ७ | ९ | ८ | ७ |
| २०१३ | २२ | ३० | ३७ | ४६ | ५४ | ६२ | ७० | ७८ | ८५ | ९४ | २१०२ |
| ३ | ३ | ||||||||||
| १८ | १८ |
इतिनक्षत्रदशा। अथ तारादशा- जन्मसम्पद्विपत्क्षेमप्रत्यरीसाधका वधः । मैत्रातिमैत्रमित्येवं दशा ज्ञेया द्विजोत्तम ।।९०।।