बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः । ४१९ जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरी, साधक, वध, मैत्र, अतिमैत्र इन ९ ताराओं की भी दशा होती है।।९०।। विंशोत्तर्याः क्रमेणैवमंकानिह विजानतः । आदौ केन्द्रग्रहाद्यस्य विज्ञेया तारकादशा ।।९१।। जिस प्रकार विंशोत्तरी दशा में ग्रहों के वर्ष कहे गये हैं वही यहां पर भी लेना चाहिये। यहां जन्म कुण्डली में जो ग्रह केन्द्र में हो वहीं से दशा का आरम्भ होता हैं।।९१।। उदाहरण-केन्द्र में ग्रहों के रहने से यह दशा होती है अन्यथा नहीं होती है। जैसे जन्मकुण्डली में केन्द्र में सूर्य है अतः जन्मतारा से दशा का आरम्भ होगा। इसका भुक्त भोग्य विंशोत्तरी दशा के समान ही निकालना चाहिये। तारादशाचक्रम् -
| ज. | स. | वि. | क्षे. | प्र. | सा. | व. | मै. | अतिमै. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सू. | चं. | मं. | श. | बृ. | श. | बु. | के. | शु. |
| ४ | १० | ७ | १८ | १६ | १९ | १७ | ७ | २० |
| १० | ||||||||
| १२ | ||||||||
| ५१ | ||||||||
| ५२ | ||||||||
| २०१ट | २८ | ३५ | ५३ | ६९ | ८८ | २१०५ | १२ | ३२ |
| २ | २ | |||||||
| १ | १ | |||||||
| १८ | १८ | |||||||
| २२ | २२ |
इति तारादशा। अथ वर्णदशामाह। जन्महोरातनूयोगो विषमो वर्णदो भवेत् । समस्तुः चक्रतः शुद्धो वर्णदो कथ्यते बुधैः ।।९२।। जन्मलग्न और होरालग्न का योग करने से योग राशि विषम हो तो वही वर्णद राशि होती है यदि योग सम हो तो १२ राशि में घटाने से शेष वर्णद होती है।।९२।। एवं द्वादशभावानां वर्णदं लग्नमानयेत् । ग्रहाणां वर्णदा नैव राशीनां वर्णदा दशा ।।९३।।