बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । इसी प्रकार १२ भावों के वर्णद राशि को लाना। ग्रहों की वर्णद दशा नहीं होती है राशियों की वर्णद दशा होती है।।९३।। होरालग्नभयोर्नेया सबलाद् वर्णदा दशा । यत्संख्यो वर्णदो लग्नात्तत्संख्या क्रमेणतु ।।९४।। क्रमव्युत्क्रमभेदेन दशा स्यात्पुरुषस्त्रियोः । वर्षसंख्यां विजानीयाच्चरदशा प्रमाणतः ।।९५।। होरालग्न और जन्माग्न दोनों में जो वली हो, और विषम हो तो क्रमगणना से यदि सम हो तो उत्क्रम गणना से वर्णद दशा होती है। यहां राशियों का वर्ष चर दशा के समान ही लेना चाहिये।।९४-९५।। अथपंचस्वरदशामाह- पञ्चाङ्कान्प्रथमे दत्वा स्वरान्वर्णांश्च विन्यसेत् । आदावकछडाद्यांश्च अन्ते ओचटवादयः ।।९६।। कादिहांताल्लिखेद्वर्णान्स्वराधोऽञणोज्झितान्। तिर्यक्पंक्तिक्रमेणैव पञ्च पञ्च विभागतः ।।९७।। पहले १ से ५ तक के अंकों को लिखकर उनके नीचे अकारादि स्वरों को और उनके नीचे ककारादि वर्णों को लिखने से किन्तु ङ. ञ. ण. वर्णों को छोड़कर प्रत्येक पंक्ति में ५ पांच वर्णों को लिखे।।९६-९७।। न प्रोक्ता ङञणावर्णा नामादौ सन्ति ते नहि । चेद्भवन्ति तदा ज्ञेया गजडास्ते यथा क्रमात् ।।९८।। ङ. ञ. ण. वर्ण का उच्चारण इस चक्र में नहीं होता है क्योंकि किसी के नामके आदि में ये वर्ण नहीं होते हैं यदि कदाचित् हो तो ङ. ञ. ण. के स्थान में क्रम से ग. ज. ड. को मानना चाहिये।।९८।। यदि नाम्नि भवेद्वर्णी संयोगाक्षरलक्षितः । ग्राह्यस्तदादिमोवर्णः इत्युक्तं ब्रह्मणापुरा ।।९९।। यदि नाम के आदि में संयोगाक्षर हो तो वहां संयुक्ताक्षर के प्रथम अंक को लेना चाहिये।।९९।। अकाराद्याः स्वराः पञ्च ब्रह्माद्याः पञ्चदेवताः । निवृत्ताद्याः कलाः पञ्च इच्छाद्या शक्तिपञ्चकम् ।।१००।। अकारादि पांच स्वरों के ब्रह्मा आदि (ब्रह्मा विष्णु शंकर-गणेश सूर्य) ये देवता हैं। निवृत्ति आदि (निवृत्ति, उपेक्षा, आदान, उपादान, प्रवृत्ति) पांच कलायें, इच्छा