भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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४२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पिङ्गला से सूर्य, मङ्गला से चन्द्रमा, भ्रामरी से भौम, भद्रिका से बुध ।।१०४।। धन्यकातो गुरुरभूत्सिद्धात् कविसम्भवः । उल्कातो भानुतनथः संकटातस्तमोऽभवत् ।।१०५।। धान्या से गुरु, सिद्धा से शुक्र, उल्का से शनि और संकटा से राहु हुये हैं।।१०५।। स्वक्षं शिखिना संयुक्तं वसुभिर्भागमाहरेत् । शेषेण योगिनी ज्ञेया शून्यपातेन संकटा ।।१०६।। जन्म नक्षत्र में ३ जोड़कर ८ से भाग देने से एकादि शेष से योगिनी को जानना शून्य शेष बचे तो संकटा होती है।।१०६।। एकाभिवृध्या वर्षाणि मङ्गला प्रमुखासुच । भुक्तं भोग्यं च संसाध्यं पुरावद्गणकोत्तमैः ।।१०७।। इनका दशा वर्ष १ से आरम्भ कर एक वृद्धि करने से क्रम से १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८ वर्ष होता है। इनका भुक्त भोग्य पूर्ववत् साधन करना चाहिये।।१०७।। उदाहरण-जन्मनक्षत्र पुनर्वसु की संख्या ७ इसमें ३ और जोड़ने से १० हुआ इसमें ८ का भाग देने से २ शेष रहा अतः पिङ्गला से दशा का आरम्भ हुआ। इसका भुक्त भोग्य पूर्ववत् भयात भभोग द्वारा निकालने से भुक्त वर्षादि ०, ४, १६, २१, १९ हुआ। अथ योगिनीदशाचक्रम् -

पि.धा.भ्रा.भ.उ.सिं.सं.मं.यो.
<br><br>१३<br>३८<br>४१
२०१३२०१४१७२१२६३२३९४७२०४८
<br>१८<br>२६<br>३४११<br><br><br>१५११<br><br><br>१५
इतियोगिनीदशा।