बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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अथ दशाध्यायः । ४२३ अथ पिंडांशादिदशामाह- पैंड्याेंशनैसर्गिकदशामायुः परिचिंतयेत् । तथाह्यष्टकवर्गे च विजानीहि द्विजोत्तम ॥१०८॥ पिंडायु, अंशायु नैसर्गिकायु और अष्टकवर्गायु पर से इनके दशा को लाना चाहिये॥१०८॥ अथ सन्ध्यादशामाह- परमायुर्द्वादशांशाः स्फुटं सन्ध्याभवेत्ततः । स्वलग्नाधिपतेरादौ क्रमेणान्यग्रहेषु च ॥१०९॥ परमायु १२० का १२ वां भाग सन्ध्या होता है उसी के तुल्य पहले लग्नेश की दशा इसके बाद क्रम से अन्य ग्रहों की दशा उतने ही वर्ष की होती है॥१०९॥ उदाहरण-परमायु १२० का १२ वां भाग १० वर्ष यह लग्नेश शनि की दशा हुई इसी के तुल्य सभी सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, राहु और केतु की दशा होगी। सन्ध्यादशाचक्रम्-
| श. | रा. | के. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | वर्ष |
| २०१३ | २३ | ३३ | ४३ | ५३ | ६३ | ७३ | ८३ | ९३ | २१०३ |
| ३ | ३ | ||||||||
| १८ | १८ | ||||||||
| अथ पाचकदशामाह- | |||||||||
| सन्ध्या रसगुणा कार्या चन्द्रवह्निहृता फलम् । | |||||||||
| संस्थाप्य प्रथमे कोष्ठे ह्यर्थमर्धत्रिकोष्ठके ॥११०॥ | |||||||||
| सन्ध्या को ६ से गुणाकर गुणनफल में ३१ का भाग देने से जो वर्षादि फल | |||||||||
| मिले उसे प्रथम कोष्ठ में लिखे। इसके आधे को अगले तीन कोष्ठों में | |||||||||
| लिखे॥११०॥ | |||||||||
| त्रिभागं वसुकोष्ठेषु लिखेद्द्विज् प्रयत्नतः । | |||||||||
| एवं द्वादशभावेषु पाचकानि प्रकल्पयेत् ॥१११॥ | |||||||||
| फिर लब्ध के तीसरे भाग को आगे के आठ कोष्ठों में लिखने से १२ भावों | |||||||||
| की पाचक दशा होती है॥१११॥ |