भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 800 में से

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पृष्ठ 423

अथ दशाध्यायः । ४२५ यह प्रथम प्रकार हुआ। इसके बाद सभी ग्रहों में जो सबसे अधिक अंशवाला हो उसकी प्रथम दशा इसके वाद इससे न्यूनांश की इसी क्रम से नवों ग्रहों की दशा होती है। यह दूसरा प्रकार है। सभी ग्रहों में नैसर्गिक बल में न्यून बलवाले की प्रथम दशा इसके बाद इससे अधिक बलवाले की इसी क्रम से सभी ग्रहों की दशा लिखना। यह तीसरा प्रकार हुआ। जन्म राशीश से दशा का आरम्भ करना। यहां दशा वर्ष ९ वर्षक ही सबका होता है। यह चौथा प्रकार है। लग्न से सप्तमेश के राशि से दशा का आरम्भकरना, यह पांचवां प्रकार है। इसी प्रकार लग्नेश का प्रथम, द्वितीयेश का दूसरा इसी क्रम से सभी भावों के राशीशों के राशि से दशा लिखना यह छठां प्रकार है। जिस नवांश में लग्न है उस नवांश के स्वामी से दशा का आरम्भ करना यह सातवां प्रकार है। अंतिम नवांश के स्वामी से क्रमशः ग्रहों का दशा आरम्भ करना, यह आठवां प्रकार है। चन्द्रमा से आरम्भ कर रवि पर्यन्त सभी ग्रहों के दशा को लिखना, यह नवां प्रकार है।।१९४।। दशामानं प्रवक्ष्यादि यथोक्तं ब्रह्मणापुरा । लिप्तीकृत्य ग्रहं व्योमखाश्विभिर्भाजिते फलम् ।।१९५।। ग्रहों की कला बनाकर २०० का भाग देने से जो फल मिले।।१९५।। पुनः सूर्यै हृते लब्धं समाद्यांशकला दशा । सर्वेषां मानवानां च दशास्त्वेता विचिंतयेत् ।।१९६।। उसमें १२ से भाग देने से वर्षादि लब्ध होगा वही दशा का मान होता है।।१९६।। इतिनवांशनवदशा। अथ राश्यंशकदशामाह- तन्वादिभावाः संस्पष्टाः प्रोक्तमार्गेणचानयेत् । लग्नेशसंस्थितो यत्र दशास्तस्यादिमो स्मृताः ।।१९७।। लग्नादि द्वादशभावों को स्पष्ट करने लग्न और लग्नेश में जो बली हो उसके नवांश राशि की प्रथम दशा।।१९७।। द्वितीयेशादितश्चाग्रे ज्ञेया राश्ययंशका दशा । चिंत्या लग्ने बलवती लग्नेशे वा बलान्विते ।।१९८।। इसके द्वितीयादि भावों के स्वामियों के नवांश राशि की दशा होती है।।१९८।। इति राश्यंशकदशा।