बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ नक्षत्रदशामाह- नक्षत्रायुर्महाप्राज्ञ पूर्णमग्रे प्रभाषितम् । विंशोत्तरी पंचधा द्विधा चाष्टोत्तरी मता ।। ११९९ ।। नक्षत्रायु के अनुसार ५ प्रकार की विंशोत्तरी दशा और दो प्रकार की अष्टोत्तरी दशा कहा गया है।।१९९।। अष्टवर्गोपरि दशा सर्वेषां चिंतयेद्विज । ततो निर्याणमालेख्यं निर्विशंकं भविष्यति ।। १२०० ।। इन सभी का फल अष्टक वर्ग के ऊपर विचार कर निर्याण दशा को लिखना यही नक्षत्र दशा होगी ।।१२०।। वलावलविवेकेन फलं ज्ञेयं दशासुच । विपरीतं फलं वाच्यं खेटे वक्रगते सदा ।। १२०१ ।। ग्रहों के बल और निर्बलता के अनुसार ही दशा का फल कहना चाहिये यदि ग्रह वक्री हो तो विपरीत (बली ग्रह में अशुभ और दुर्बल में शुभं) फल कहना चाहिये ।।१२१।। आदिद्रेष्के स्थिते खेटे दशारम्भे फलं वदेत् । दशामध्ये फलं वाच्यं मध्यद्रेष्काणके स्थिते ।। १२०२ ।। यदि दशेश प्रथम द्रेष्काण में हो तो अपना शुभ अशुभ फल दशा के आरम्भ में दूसरे द्रेष्कारा में हो तो दशा के मध्य में ।।१२२।। अन्ते फलं तृतीयस्थे व्यस्तं खेटे च वक्रिणि । इति ते कथिता विप्र दशाभेदा अनेकशः । यस्मै कस्मै न दातव्यं ज्ञानमेतत्सुदुर्लभम् ।। १२०३ ।। और तीसरे द्रेष्काण में हो तो दशा के अंत में अपने फल को देता है। यदि ग्रह वक्री हो तो इससे विपरीत फल देता है। हे विप्रः यह अनेक प्रकार के दशा के भेदों को कहा इस दुर्लभ ज्ञान को जिस किसी को नहीं देना चाहिये ।।१२३।। इति दशाभेदाध्यायः । अथ दशाफलाध्यायः । तत्रादौ विंशोत्तरीमतेन सूर्यमहादशाफलम् - सूर्योत्कृष्टदशा करोति सुतधीप्रज्ञाधिकारोच्चय- ज्ञानार्थागमकीर्तिपौरुषसुखप्राप्तीश्वरानुग्रहात् ।