बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 425, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें३५थ दशाफलाध्यायः । ४२७ भानोः पापदशा करोति विफलोद्योगार्थहान्यामया- त्राजक्षोभमहीशकोपजनकारिष्टाग्निवाथोदयात् ॥१॥ उत्तमबली सूर्य की दशा में पुत्र, बुद्धि, अधिकार, ऊचेंज्ञान, धन का लाभ, यश, पौरुष, सुख की प्राप्ति होती है। सूर्य की निकृष्ट दशा में उद्योग में विफलता, द्रव्य की हानि, व्याधि, राजा की अप्रसन्नता से कष्ट, अरिष्ट, अग्नि से भय होता है॥१॥ मूलत्रिकोणे स्वक्षेत्रं स्वोच्चे वापरमोच्चके । केन्द्रत्रिकोणलाभस्थे भाग्यकर्माधिपैर्युते ॥२॥ यदि सूर्य अपने मूलत्रिकोण राशि, स्वराशि, अपने उच्च वा परमोच्च में होकर केन्द्र वा त्रिकोण वा एकादश भाव में भाग्येश कर्मेश से युत हो॥२॥ बलं सूर्ये समायुक्ते निजवर्गे बलैर्युते । तस्मिन्दाये महासौख्यं धनलाभादिकं शुभम् ॥३॥ और अपने वर्ग में हो तो इसके दशा में अत्यंत सुख, धन का लाभ आदि शुभ फल होता है॥३॥ अत्यंतं राजसन्मानमश्वांदोल्यादिकं शुभम् । सुताधिप समायुक्ते पुत्रलाभं च विदंति ॥४॥ पंचमेश से युत हो तो राजा से सन्मान घोड़ा आदि सवारियों का सुख तथा पुत्र का लाभ होता है॥४॥ धनेशस्य च संबंधे गजांतैश्वर्यमादिशेत् । वाहनाधिप सम्बंधे वाहनत्रयलाभकृत् ॥५॥ धनेश से युत हो तो हाथी घोड़ा आदि ऐश्वर्य से संपन्न होता है। वाहनेश से युत हो तो वाहनों का लाभ होता है॥५॥ नृपालतुष्टिर्वित्ताढ्यः सेनाधीशः सुखीनरः । वस्त्रवाहनलाभश्च इतिदाये रवौबली ॥६॥ तथा राजा की प्रसन्नता से धनी, सेनाधीश और सुखी होता है॥६॥ नीचे षडष्टके रिष्फे दुर्बले पापसंयुते । राहु केतु समायुक्ते दुःस्थानाधिपसंयुते ॥७॥ यदि सूर्य अपने नीच राशि में ६, ८, १२ भाव में हो दुर्बल हो पापग्रह से युत हो वा राहु केतु से युत हो वा ६, ८, १२ वें भावों के स्वामी से युत हो तो॥७॥