बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 426, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें४२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । तस्मिन्दाये महापीड़ा धनधान्य विनाशकृत् । राजकोपं प्रवासं च राजदंडाद्धनक्षयम् ।।८।। उसकी दशा में महापीड़ा, धन, धान्य की हानि राजकोप, विदेश यात्रा, राजदंड से धन की हानि।।८।। ज्वरपीडा यशोहानिर्बन्धुमित्र विरोधकृत् । प्रवासं रोगविद्वेषं ह्यपमृत्युभयं भवेत् ।।९।। ज्वर, यश की हानि, बन्धुओं मित्रों से विरोध, प्रवास, रोग, शत्रुता अकाल मृत्यु का भय।।९।। चौराहिब्रणभीतिश्च ज्वरबाधा भविष्यति । पितृक्षयंभयं चैव गृहे त्वशुभमेव च ।।१०।। चौर का भय, घोड़ा आदि का भय, पिता को अरिष्ट, चाचा आदि से मन में संताप, लोगों से द्वेष होता है।।१०।। पितृवर्गे मनस्तापं जनद्वेषं च विंदति । शुभदृष्टि युते सूर्ये मध्ये तस्मिन्क्वचित्सुखम् । पापग्रहेण संदृष्टे वदेत्पापफलं नरः ।।११।। सूर्य शुभ दृष्ट.हो तो मध्य में शुभफल भी होता है और पापदृष्ट हो तो पापफल ही होता है।।११।। इति रविदशाफलम्। अथ चन्द्रदशाफलम् - चन्द्रोत्कृष्टदशा करोति जननीश्रेयस्तडागादिकं क्षेत्रारामगृहासनद्विजवरश्रीशोभनांदोलिका । इन्दोः पापदशान्हीनकृपणानंतार्थनाशामय- प्रज्ञाहीनजुगुप्सुमातुमरणक्षोभातिशीतज्वरान् ।।१२।। चन्द्रमा के उत्तम दशा में माता का सुख, तालाब, खेत, बगीचा, गृह आसन, ब्राह्मण, लक्ष्मी, यश, सवारी का सुख होता है। चन्द्रमा के पापदशा में धन की क्षति, कृपण बुद्धि, धन की हानि, द्रव्य की हानि, माता को कष्ट, शीतज्वर से कष्ट होता है।।१२।। स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे चैव केन्द्रलाभत्रिकोणगे । शुभग्रहेण संयुक्ते वृद्धिचन्द्रेवलैर्युते ।।१३।।