भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 428

४३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे दुर्बले पापसंयुते । राजद्वेषो मनोदुःखं धनधान्यादिनाशनम् ।।२१।। यदि चन्द्रमा दुर्बल और पापयुक्त हो तो देह में जड़ता और मानसिक दुःख होता है। नौकर को कष्ट, धन की हानि, माता को कष्ट होता है।।२१।। मातृक्लेशं मनस्तापं देहजाड्यं मनोरुजम् । दुःस्थे चन्द्रेवलैर्युक्ते क्वचिल्लाभं क्वचित्सुखम् ।।२२।। यदि दुर्बल चन्द्रमा ६, ८, १२ भाव में पापयुक्त हो तो राजा से द्वेष, मानसिक दुःख, धन, धान्य का नाश।।२२।। माता को कष्ट, मन में संताप, देह में जड़ता होती है। दुःस्थान में चन्द्रमा बली हो तो कभी लाभ और कभी सुख होता है।।२२।। इति चन्द्रदशाफलम्। अथ भौमदशाफलम्- परमोच्चगते भौमे स्वोच्चे मूलत्रिकोणगे । स्वक्षेत्रे केन्द्रत्रिकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा ।।२३।। मंगल परमोच्च में वा उच्च में अथवा मूलत्रिकोण में वा अपनी राशि में होकर केन्द्र त्रिकोण में वा एकादश वा धन भाव में।।२३।। सम्पूर्णबल संयुक्ते शुभदृष्टे शुभांशके । राज्यलाभं भूमिलाभं धनधान्यादिलाभकृत् ।।२४।। पूर्ण बली हो शुभग्रह से युत दृष्ट हो और शुभग्रह के नवांश में हो तो राज्य लाभ, भूमि लाभ, धन, धान्यादि का लाभ होता है।।२४।। आधिक्यं राजसन्मानं वाहनाम्बरभूषणम् । विदेशे स्थानलाभं च सोदराणां सुखं लभेत् ।।२५।। राजसन्मान में वृद्धि, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ होता है। विदेश में स्थान का लाभ और भाइयों से सुख होता है।।२५।। केन्द्रं गते सदा भौमे दुश्चिक्ये बलसंयुते । पराक्रमाद्वित्तलाभो युद्धे शत्रुक्षयो भवेत् ।।२६।। यदि बली भौम केन्द्र में वा तीसरे भाव में हो तो पराक्रम से धन का लाभ और युद्ध में विजय होती है शत्रुओं का नाश होता है।।२६।।