बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाफलाध्यायः । ४३१ कलत्रपुत्रविभवं राजसन्मानमेव च । दशादौ सुखमाप्नोति दशांते कष्टमादिशेत् ॥१२७॥ स्त्री, पुत्र, धन का लाभ, राजा से सम्मान की प्राप्ति होती है। दशा के आदि में सुख का लाभ और दशा के अंत में कष्ट होता है॥१२७॥ नीचादिदुःस्थगे भौमे शुभवलविधर्जिते । पापयुक्ते पापदृष्टे सा दशा नेष्टदायिका ॥१२८॥ मंगल नीच में दुष्टस्थान (६, ८, १२) में हो शुभग्रह के सम्पर्क से रहित हो, पापयुक्त, पाप दृष्ट हो तो भौम की दशा कष्टप्रद होती है॥१२८॥ इति भौमदशाफलम्। अथ राहुदशाफलम् - राहोश्च वृषभं केतोर्वृश्चिकं तुङ्गसंज्ञकम् । मूलत्रिकोणं कर्कं च युग्मचापं तथैव च ॥१२९॥ राहु का वृष और केतु का वृश्चिक राशि उच्च राशि है। राहु का कर्क और केतु का मिथुन धन राशि मूल त्रिकोण है॥१२९॥ कन्या च स्वगृहं प्रोक्तं मीनं च स्वगृहंस्मृतम् । तद्दाये बहुसौख्यं च धनधान्यादिसम्पदाम् ॥१३०॥ राहु का कन्या और केतु का मीन स्वराशि है। स्वगृहादि में स्थित राहु की दशा में अनेक सुख, धन, धान्य आदि संपत्ति का लाभ होता है॥१३०॥ मित्रप्रभुवशादिष्टं वाहनं पुत्रसम्भवः । नूतनगृहनिर्माणं धर्मचिन्ता महोत्सवः ॥१३१॥ मित्र और स्वामी से इष्ट सिद्धि, वाहन का सुख पुत्र का लाभ, नये नये मकान का निर्माण, धार्मिक कार्य होता है॥१३१॥ विदेशे राजसन्मानं वस्त्रालंकार भूषणम् । शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे योगकारकसंयुते ॥१३२॥ विदेश यात्रा और राजा से सम्मान की प्राप्ति वस्त्र आभूषण का लाभ॥१३२॥ केन्द्रत्रिकोणलाभे वा दुश्चिक्ये शुभराशिगे । महाराजप्रसादेन सर्वसम्पत्सुखावहम् ॥१३३॥