भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 430

४३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यदि राहु शुभग्रह से देखा जाता हो वा शुभयुक्त हो योग कारक ग्रह से देख जाता हो केन्द्र त्रिकोण में वा क्रूर भाव में हो तो राजा की कृपा से सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति।।३३।। यवनप्रभूसन्मानं गृहे कल्याणसम्भवम् । रन्ध्रे वा व्ययगे राहौ तद्दाये कष्टमालभेत् ।।३४।। म्लेक्ष राजा से सम्मान और गृह में सुख का प्रादुर्भाव होता है। यदि राहु आठवें वा बारहवें भाव में हो तो उसके दशा में कष्ट की प्राप्ति होती है।।३४।। पापग्रहेण सम्बन्धे मारकग्रह संयुते । नीचराशिगते वापि स्थानभ्रंशं मनोरुजम् ।।३५।। पापग्रह से सम्बंध करता हो और मारकेश से युक्त हो वा नीचाशि में गया हो तो स्थान भ्रष्ट और मानसिक कष्ट होता है।।३५।। विनश्येद्दारपुत्राणां कुत्सितानां च भोजनम् । दशादौ देहपीडा च धनधान्य परिच्युतिः ।।३६।। स्त्री पुत्र के सुख की हानि, खराब भोजन मिलता है। दशा के आरम्भ में शरीर में पीड़ा, धन, धान्य की हानि।।३६।। दशामध्ये च सौख्यं स्यात्स्वदेशे धनलाभकृत् । दशान्ते कष्टमाप्नोति स्थानभ्रंशो मनोव्यथा ।।३७।। दशा के मध्य में सुख और स्वदेश में धन का लाभ होता है। दशा के अन्त में कष्ट, स्थानच्युति और मानसिक कष्ट होता है।।३७।। इति राहुदशाफलम्। अथ गुरुदशाफलम् – स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे जीवे केन्द्रे लाभत्रिकोणगे । मूलत्रिकोणलाभे वा तुङ्गांशे स्वांशगेऽपि वा ।।३८।। यदि गुरु अपने उच्चराशि में, अपने राशि में केन्द्र, लाभ वा त्रिकोण में, अपने मूलत्रिकोण राशि में, उच्चांश में वा अपने नवांश में हो।।३८।। राज्यलाभं महत्सौख्यं राजसन्मानकीर्तनम् । गजवाजिसमायुक्तं देवब्राह्मणपूजनम् ।।३९।। तो उसकी दशा में राज्य का लाभ, सुख, राजा से सम्मान और कीर्ति हाथी घोड़े का सुख, देवता ब्राह्मण का पूजन।।३९।।