बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाफलाध्यायः । ४३३ दारपुत्रादि सौख्यं च वाहनाम्बरलाभदम् । यज्ञादिकर्मसिद्धिः स्याद्वेदान्तश्रवणादिकम् ।।४०।। यज्ञ आदि कार्यों की सिद्धि, वेदादि का श्रवण कीर्तन ।।४०।। महाराज प्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा । आंदोलिकादिलाभश्च कल्याणं च महत्सुखम् ।।४१।। राजा की प्रसन्नता से इष्ट सिद्धि और सुख का लाभ, सवारी का लाभ कल्याण और सुख ।।४१।। पुत्रदारादिलाभश्च अन्नदानं महत्प्रियम् । नीचास्तपापसंयुक्ते जीवे रिष्फाष्टसंयुते ।।४२।। पुत्र स्त्री का लाभ और अन्नदान आदि कर्म होते हैं। यदि गुरु नीच राशि में, अस्तंगत, पापयुक्त और ६, ८, १२ भाव में हो तो ।।४२।। स्थानभ्रंश मनस्तापं पुत्रपीडा महद्भयम् । पश्चादिधनहानिश्च तीर्थयात्रादिकं लभेत् ।।४३।। स्थान भ्रष्ट, मन में संताप, पुत्र को पीडा, भय, पशु आदि की हानि तीर्थयात्रा आदि होती है ।।४३।। आदौ कष्टफलं चैव चतुष्पाज्जीव लाभकृत् । मध्यान्ते सुखमाप्नोति राजसन्मान वैभवम् ।।४४।। दशा के आदि में कष्ट चतुष्पद आदि का लाभ, और मध्य तथा अंत्य में सुख राजा से सन्मान की प्राप्ति होती है ।।४४।। इति गुरुदशाफलम् । अथ शनिदशाफलम् - स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे मन्दे मित्रक्षेत्रेऽथवा यदि । मूलत्रिकोणे भाग्ये वा तुङ्गांशेस्वांशगेऽपिवा ।।४५।। यदि शनि अपनी उच्च राशि, अपनी राशि, मित्र की राशि, अपनी मूलत्रिकोण राशि, भाग्यभाव, अपने उच्चांश में, अपने नवांश में ।।४५।। दुश्चिक्ये लाभगे चैव राजसन्मानवैभवम् । सत्कीर्तिर्धनलाभश्च विद्यावादविनोदकृत् ।।४६।। तीसरे वा लाभ भाव में हो तो राजा से सम्मान और वैभव का लाभ, कीर्ति, धन का लाभ, विद्या का विनोद ।।४६।।