बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । महाराजप्रसादेन गजवाहनभूषणम् । राजयोगं प्रकुर्वीत सेनाधीशान्महत्सुखम् ॥४७॥ राजा की प्रसन्नता से हाथी आदि वाहन का सुख, आभूषण का लाभ, राजयोग, सेनाधीश होने से सुख ॥४७॥ लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि राज्यलाभं करोति च । गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिलाभकृत् ॥४८॥ लक्ष्मी की प्रसन्नता से राज का लाभ, गृह में कल्याण, सम्पत्ति का लाभ, स्त्री पुत्रादि का सुख होता है॥४८॥ षष्ठाष्टमव्यये मंदे नीचेवास्तङ्गतेऽपि वा । विषशस्त्रादिपीडा च स्थानभ्रंशं महद्भयम् ॥४९॥ यदि शनि ६, ८, १२ भाव में हो नीच राशि में वा अस्तंगत हो तो विष, शस्त्र आदि से पीड़ा होती है, स्थानच्युति और भय होता है॥४९॥ पितृमातृवियोगं च दारपुत्रादिपीडनम् । राजवैषम्य कार्याणि ह्यनिष्टं बंधनं तथा ॥५०॥ पिता माता से वियोग, स्त्री पुत्र आदि को पीडा, राज के विलोम कार्य अनिष्ट और बंधन होता है॥५०॥ शुभयुक्तेक्षिते मंदे योगकारक संयुते । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा मीनगे कार्मुके शनौ ॥५१॥ शनि शुभग्रह से युत हो केन्द्र त्रिकोण वा लाभ भाव में हो मीन वा धन राशि में हो तो॥५१॥ राज्यलाभं महोत्साहं गजाश्वाम्बरसंकुलम् ॥५२॥ राज्य लाभ, उत्साह हाथी तथा प्रभूत वस्त्रादि का लाभ होता है॥५२॥ इति शनिदशाफलम्। अथ बुधदशाफलम् - स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुक्ते केन्द्रलाभत्रिकोणगे । मित्रक्षेत्रसमायुक्ते सौम्यदाये महत्सुखम् ॥५३॥ बुद्ध अपनी उच्चराशि अपनी राशि में हो, केतु त्रिकोण में, मित्र की राशि में हो तो इसकी दशा में अत्यन्त सुख॥५३॥