बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: ४३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ केतुदशाफलम् - केन्द्रलाभत्रिकोणे वा शुभराशौ शुभेक्षिते । स्वोच्चे वा शुभवर्गे वा राजप्रीतिंमनोत्साहम् ।।६१।। केतु केन्द्र, लाभ, त्रिकोण में हो.वा शुभ ग्रह की राशि में शुभ दृष्ट से अथवा अपने उच्च राशि में वा शुभ ग्रह के वर्ग में हो तो उसकी दशा में राजा से प्रेम, मन में उत्साह ।।६१।। देशग्रामाधिपत्यं च वाहनं पुत्रसम्भवम् । देशान्तरेप्रयाणं च अन्यदेशे सुखावहम् ।।६२।। देश ग्राम का आधिपत्य, वाहन, और पुत्र का लाभ, देशान्तर की यात्रा और वहाँ सुख का लाभ ।।६२।। पुत्रदारसुखंचैव चतुष्पाज्जीवलाभकृत् । दुश्चिक्ये षष्ठलाभे वा केतोर्दये सुखंभवेत् ।।६३।। पुत्र-स्त्री का सुख, चतुष्पद का सुख होता है। ३, ६, ११ भाव में केतु हो तो इसकी दशा में सुख होता है।।६३।। राज्यं करोति मित्रांशे गजवाजिसमन्वितम् । दशादौ राजयोगाश्च दशामध्ये महद्भयम् ।।६४।। मित्र के अंश में हो तो राज्य का लाभ और हाथी घोड़े से युक्त होता है। दशा के आरम्भ में राजयोग का सुख, मध्य में बड़ा भय ।।६४।। अंते दूराटनं चैव देहविश्रवणं तथा । धने रंध्रेव्यये केतौ पापद्दष्टियुतेक्षिते ।।६५।। और अंत में दूरयात्रा देह पीडा यदि केतु २, ८, १२ भाव हो तो और पापग्रह से दृष्टयुत हो तो ।।६५।। निगडं बन्धुनाशं च स्थानभ्रंशं मनोरुजम् । शूद्रक्षुद्रादिलाभं च नानारोगाकुलं भवेत् ।।६६।। बन्धन, बन्धुओं की हानि, स्थानच्युति और मानसिक कष्ट होता है। शुद्र द्वारा क्षुद्र लाभ और अनेक रोग से मनुष्य व्यग्र होता है।।६६।। इति केतुदशाफलम्। अथ शुक्रदशाफलम्। परमोच्चगते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । नृपाभिषेक सम्प्राप्तिर्वाहनाम्बरभूषणम् ।।६७।।