भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ दशाफलाध्यायः । ४३७ शक्र परमोच्च में वा उच्च में वा अपने राशि में केन्द्र में हो तो इसकी दशा में राज्याभिषेक का लाभ, वाहन, वस्त्र और आभूषण का लाभ॥६७॥ गजाश्वपशुलाभं च नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । अखंडमंडलाधीशराजसन्मानवैभवम् ॥६८॥ हाथी घोड़े का लाभ, नित्य मिष्टान्न भोजन, अखंड राज्य का लाभ, राजसम्मान और वैभव का लाभ॥६८॥ मृदङ्गवाद्ययोगं च गृहेलक्ष्मीकटाक्षकृत् । त्रिकोणस्थे मीन शुक्रे राज्वार्थगृहसम्पदः ॥६९॥ मृदङ्ग आदि बाजा का सुख, गृह में लक्ष्मी का वास होता है यदि मीन राशि में शुक्र त्रिकोण में हो तो राज्य धन, गृह, संपत्ति॥६९॥ विवाहोत्सवकार्याणि पुत्रकल्याणवैभवम् । सेनाधिपत्यं कुरुते इष्टबन्धु समागमम् ॥७०॥ विवाहादि उत्सव, पुत्र प्राप्ति, सेनाधिपत्य और मित्र, बन्धुओं का समागम॥७०॥ नष्टराज्याद्धनप्राप्तिर्गृहे गोधनसंग्रहम् । षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे नीचे वा व्ययराशिगे ॥७१॥ और नष्ट राज्य से धन का लाभ और गोधन से सुख होता है। ६।८।१२ भाव में अथवा अपने नीच राशि में वा बारहें भाव में शुक हो तो॥७१॥ आत्मबन्धुजनद्वेषं दाश्वर्गादिपीडनम् । व्यवसायात्फलं नष्टं गोमहिष्यादि हानिकृत् ॥७२॥ उसकी दशा में अपने बन्धुओं से द्वेष स्त्री वर्ग से पीड़ा, व्यवसाय में हानि, गौ, भैंस आदि को पीड़ा॥७२॥ दारपुत्रादिपीडा वा आत्मबन्धु वियोगकृत् । भाग्यकर्माधिपत्येन लग्नवाहनराशिगे ॥७३॥ स्त्री पुत्रादि को कष्ट और आत्मीय लोगों से वियोग होता है। शुक्र भाग्येश वा कर्मेश होकर लग्न वा चतुर्थ स्थान में हो तो॥७३॥ तद्दशायां महत्सौख्यं देशग्रामाधिपत्यताम् । देवालयतडागादि पुण्यकर्मसु संग्रहम् ॥७४॥ उसकी दशा में बहुत ही सुख, देश वा ग्राम का आधिपत्य, देवालय तालाब आदि पुण्य कार्य होते हैं॥७४॥