भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 800 में से

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४४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वाहन, ग्राम का लाभ और पशुओं की वृद्धि होती है। यदि चन्द्रमा हो तो इष्ट की सिद्धि और रसयुक्त धान्य का लाभ होता है।।१०१।। पूर्णेविधौ निधिप्राप्तिर्भेद्व्या मणिसंचयम् । तत्र शुक्रे मृदङ्गादि वाद्यमान पुरस्कृतः ।।१०२।। यदि चन्द्रमा पूर्ण हो तो निधि (गड़े हुये धन) का नाश वा मणि का लाभ होता है। यदि शुक्र हो तो मृदङ्ग आदि बाजे का लाभ और मानपत्र से पुरस्कृत होता है।।१०२।। आंदोलिकाप्तिर्जीवे तु कनकांदोलिकाध्रुवम् । लग्नकर्मेशभाग्येश तुङ्गस्थ शुभयोगतः ।।१०३।। गुरु हो तो सुवर्ण की पालकी का लाभ होता है। लग्नेश कर्मेश भाग्येश यदि अपने उच्च राशि में हो तो शुभ योग होता है।।१०३।। सर्वोत्कर्षमहैश्वर्यसाम्राज्यादि महत्फलम् । एवं तत्तद्भावबलदायफलं यत्स्याद्विचिंतयेत् ।। एकैवोडुदशा स्वीया गुणैरष्टादशात्मना । भिन्ना फलेविपाकस्तु कुर्याद्वैचित्रसंयुतम् ।।१०४।। इसमें सभी प्रकार की उन्नति, ऐश्वर्य राज्य आदि का लाभ होता है। इसी प्रकार से सभी भावों से फल का विचार करना चाहिये। एक एक राशि को वा ग्रह की दशा अपने १८ गुणों से भिन्न भिन्न फलों को देने वाली होती है।।१०४।। परमोच्चे तुङ्गमात्रे तदर्वाक्तदुपर्यपि । मूलत्रिकोणभे स्वक्षे स्वाधिमित्रग्रहस्यभे ।।१०५।। वे १८ गुण इस प्रकार हैं— परमोच्च केवल उच्च में, इसके पूर्व या आगे, मूलत्रिकोण, स्वराशि अधिमित्र की राशि।।१०५।। तत्कालसुहृदो गेहे उदासीनस्य भे तथा । शत्रोर्भेऽधिरिपोर्भे च नीचान्तादूर्ध्व देशभे ।।१०६।। तात्कालिक मित्रराशि, सम की राशि शत्रु की राशि, अधिशत्रु की राशि, नीचराशि या उससे पूर्व या आगे।।१०६।। तस्मादर्वाङ् नीचमात्रे नीचान्ते परमांशके । नीचारिवर्गे सखले स्ववर्गे केन्द्रकोणभे ।।१०७।।

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