भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ दशाफलाध्यायः । ४४३ नीच परमनीच में, नीच वा शत्रुवर्ग में, पापयुक्त, अपने वर्ग में, केन्द्रकोण में।।१०७।। व्यवस्थितस्य खेटस्य समरे पीडितस्य च । गाढमूढस्य च दशापचिति स्वगुणैः फलम् ।।१०८।। युद्ध में पीडित, परमअस्त में गये हुये ग्रहों की दशा अपने गुण के अनुसार फलदायक होती है।।१०८।। परमोच्चगतो यस्तु योऽतिवीर्यचरित्रवान् । सम्पूर्णाख्या च तद्दशा राज्यभोग्यशुभप्रदा ।।१०९।। जो ग्रह परमोच्च में हो और अत्यंत बली हो उसकी दशा को सम्पूर्ण कहते हैं, उसकी दशा में राज्य का सुख और शुभफल होते हैं।।१०९।। लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानां चिदावासगृहप्रदा । तुङ्गमात्रगतस्यापि तथा वीर्याधिकस्य च ।।११०।। और लक्ष्मी की कृपा होती है तथा गृह की प्राप्ति होती है। जो केवल उच्चराशि में हो और अधिक बली हो।।११०।। पूर्णाख्या बहुधैश्वर्यदान्यपि रुजप्रदा । अतिनीचगतस्यापि दुर्बलस्य ग्रहस्य तु ।।१११।। उसकी दशा को पूर्णा कहते हैं, वह ऐश्वर्य को देने वाली होते हुये भी रोगप्रद होती है। अस्तंगत नीच में गये हुये दुर्बलग्रह की दशा को।।१११।। रिक्तासानिष्टफलदा न्याध्यनर्थमृतिप्रदा । अत्युच्चेऽप्यतिनीचंगे मध्यगस्यावरोहिणी ।।११२।। रिक्ता कहते हैं इस दशा में अनिष्ट फल, व्याधि, अनेक अनर्थ होते हैं। अत्यंत उच्च और अत्यंत नीच के मध्य में गये हुये ग्रहं की दशा को अवरोहिणी कहते हैं।।११२।। मित्रोच्चभावप्राप्तस्य मध्याख्याह्यर्थदा दशा । नीचान्तादुच्चभागान्तं भषट्के मध्यमस्य च ।।११३।। जो ग्रह मित्र की राशि या उच्चराशि में हो उसकी दशा का नाम मध्या होता है वह ध्यान देने वाली होती है। नीचे से उच्च तक ६. राशि के मध्य में रहने वाले ग्रह की।।११३।। दशाचारोहिणी नीचरिपुभांशगंतस्य च । अधमाख्या भयक्लेश व्याधिदुःखविवर्धिनी ।।११४।।