भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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४४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । तया दशा आरोहिणी कहते हैं, नीच शत्रु की राशि या नवांशगत ग्रह ग्रह की दशा को अधम दशा कहते हैं यह दशा भय, कष्ट व्याधि दुःख को बढ़ाने वाली होती है।।११४।। नामानुरूपफलदाः पाककाले दशाक्रमात् । भाग्येशगुरुसम्बन्धो योगदृक्केन्द्रभादिभिः ।।११५।। अपने-अपने नाम के अनुरूप ही अपने-अपने दशा का फल होता है। यदि अन्य ग्रह के साथ भाग्येश, गुरु का योग, दृष्टि, केन्द्र आदि में कोई सम्बन्ध होता है।।११५।। परेषामपि दायेषु भाग्योपक्रममुन्नयेत् । जातको यस्तु फलदो भाग्यप्रदोऽथ यः ।।११६।। तो उस ग्रह की दशा में भी भाग्य वृद्धि होती है। जन्म समय भाग्योदय आदि फल देने वाला ग्रह हो ।।११६।। सफलो वक्रिमादूर्ध्वमन्यानपि च खेचरात् । दुर्बला न समर्थाश्च फलदानेषु योगतः ।।११७।। वह वक्रगति को छोड़ने के बाद फलप्रद होता है। इसी प्रकार जो दुर्बल और असमर्थ है वह भी योग होने से फल देने में समर्थ हो जाता है।।११७।। तारतम्यात्सुसम्बन्धा दशा ह्येताः फलप्रदाः । स्वकेन्द्रादिजुषां तेषां पूर्णाद्धर्धिघ्र्यव्यवस्था ।।११८।। इस प्रकार तारतम्य से अच्छे सम्बन्ध से दशा फलप्रद होती है। तथा दशेश के केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम में रहने से पूर्ण, आधा और चौथाई दशा का फल तारतम्य से होता है।।११८।। शीर्षोदयस्थिताः स्वस्वदशादौ स्वफलप्रदा । उभयोदयराशिस्थः मध्यफलप्रदा ।।११९।। शीर्षोदय राशि में बैठा हुआ ग्रह अपनी दशा के आदि में अपने शुभ अशुभ फल को देता है, द्विस्वभाव राशिगत ग्रह दशा के मध्य में ।।११९।। पृष्ठोदयर्क्षगाः खेटाः स्वदशान्ते फलप्रदाः । निसर्गतश्च तत्काले सुहृदां हरणेशुभम् ।।१२०।। अपने शुभ अशुभ फल को देता है। पृष्ठोदय राशि में गया हुआ ग्रह अपनी दशा के अन्त में अपने शुभ अशुभ फल को देता है। नैसर्गिक वा तत्काल में मित्र ग्रह के अन्तरदशा में शुभ फल होता है।।१२०।।