भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 443

अथ दशाफलाध्यायः । ४४५ सम्पादयेत्तदा कष्टं तद्विपर्ययगामिनाम् । दशेशाक्रांत भावाच्चारभ्य द्वादशर्क्षभम् ।।१२१।। और शत्रुग्रह की अन्तरदशा में अशुभ फल होता है (दशेश जिस भाव में हो वहाँ से आरम्भ कर १२ राशियों की अन्तरदशा होती है।।१२१।। भुक्त्वा द्वादशराशीनां दशाभुक्तिं प्रकल्पयेत् । एकैकराशेर्या तत्र सुहृऽस्वक्षेत्रगामिनी ।।१२२।। उसमें भी जो राशि मित्र राशिस्थ वा अपने राशिस्थ ग्रह से युत हो उसकी अन्तरदशा में राज्यादि सम्पत्ति पूर्वक शुभ फल होता है।।१२२।। तस्यां राज्यादिसम्पत्तिपूर्वकं शुभमीरयेत् । दुःस्थानरिपुनीचस्थनीचक्रूरयुता च या ।।१२३।। जो राशि शत्रुराशिस्थ, नीचस्थ, नीचक्रूरयुक्त ग्रह से युत हो उसके।।१२३।। तस्यामनर्थकलहं रोगमृत्युभयादिकम् । बिन्दुभूयस्त्वशून्यत्ववशात् स्वीयाष्टवर्गके ।।१२४।। अन्तरदशा में अनर्थ, कलह, रोग, मृत्युभय आदि दुष्ट फल होते हैं, अष्टकवर्ग के अनुसार।।१२४।। वृद्धिं हानिं च तद्राशियावस्य स्वगृहात्क्रमात् । भावयोजनया विद्यात्सुताद्यादि शुभाशुभम् ।।१२५।। धात्वादिराशिभेदाच्च धात्वादिग्रहयोगतः । शुभपापदशाभेदाच्छुभपापयुतैरपि ।।१२६।। जिस राशि में रेखा या बिन्दु अधिक हो उसमें शुभफल और जिसमें रेखा वा बिन्दु अल्प हो उसमें हानि होती है। (यहाँ कोई आचार्य अष्टकवर्ग में शुभद्योतक रेखा और कोई शुभद्योतक शून्य को मानते हैं)। भाव के योजना के अनुसार (अर्थात् लग्न आदि भावों से जिस भाव का विचार करना हो उसी को लग्न मानकर उससे अन्य भावों से उनके शुभ अशुभ का विचार करना चाहिये) जैसे भाई के सुख दुःखादि का विचार करना है तो तीसरे भाव को लग्न मानकर उससे दूसरे भाव से भाई के धन आदि का विचार करना चाहिये।।१२५।। राशियों के धातु आदि के भेद से और ग्रहों के धातु आदि के भेद से उन- उन राशियों वा शुभ पापदशा भेद और शुभ पाप के योग से।।१२६।।