बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राजकोप, इष्टवस्तु का नाश, पापमूल से धन का नाश देह में कष्ट और मानसिक कष्ट होता है।।५५।। स्वर्णदानं प्रकुर्वीत इष्टजाप्यं च कारयेत् । गवां कपिलवर्णानां दानेनारोग्यमादिशेत् ।।५६।। शान्ति के लिये सोना का और कपिला गौ का दान करना चाहिये। इष्टदेव (गुरु) का जप कराने से आरोग्यता प्राप्ति होती है।।५६।। अथ रविदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । शत्रुनाशं महत्सौख्यं स्वल्पधान्यार्थलाभकृत् ।।५७।। सूर्य की दशा में लग्न से केन्द्र त्रिकोण में गये हुये शनि के अतर में शत्रुओं का नाश, सुख, अल्प धन धान्य आदि का लाभ।।५७।। विवाहोत्सव कार्याणि शुभकार्य शुभावहम् । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे मन्दे सुहृद्ग्रहसमन्विते ।।५८।। विवाहोत्सव आदि कार्य, शुभ क्रियायें होती हैं। यदि शनि अपने उच्च, अपनी राशि में हो अपने मित्र ग्रह से युत हो तो।।५८।। गृहेकल्याणसम्पत्तिर्विवाहादि च सत्क्रियाम् । राजसन्मानकीर्त्तिश्च नानावस्त्रधनागमः ।।५९।। गृह में कल्याण, सम्पत्ति, विवाहादि अच्छी क्रियायें, राजा से सम्मान, कीर्त्ति और अनेक प्रकार के वस्त्र तथा धन का लाभ होता है।।५९।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते । वातशूलमहाव्याधिज्वरातीसारपीडनम् ।।६०।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो वात, शूल, महाव्याधि, ज्वर, अतिसार की पीड़ा।।६०।। बन्धनं कार्यहानिश्च वित्तनाशं महद्भयम् । अकस्मात्कलहश्चैव दायादजनविग्रहम् ।।६१।। बन्धन, कार्य की हानि, धन का नाश, बड़ा भय, अकस्मात् झगड़ा, दायादों से विग्रह होता है।।६१।। भुक्त्यादौ मित्रहानिः स्यान्मध्ये किंचित्सुखावहम्। अन्ते क्लेशकरं चैव नीचे तेषां तथैव च ।।६२।।