भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 800 में से

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अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५७ अन्तर के आदि में मित्रों की हानि, मध्य में कुछ सुख और अन्त में क्लेश होता है, इसी प्रकार नीच राशि में रहने से भी होता है।।६२।। पितृमातृवियोगं च गमनागमनं तथा । द्वितीयद्यूननाथेतु अपमृत्युभयं भवेत् ।।६३।। यदि शनि २।७ भावों का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। पिता माता का वियोग और आनाजाना लगा रहता है।।६३।। कृष्णां गां महिषीं दद्यान्मृत्युञ्जय जपं चरेत् । छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।६४।। शान्ति के लिये काली गौ, भैंस का दान करना चाहिये और मृत्युञ्जय का जप करना चाहिये और बकरी का दान करने से सभी सुख का लाभ होता है।।६४।। अथ रविदशायांबुधान्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते सौम्ये स्वोच्चे वास्वर्क्षगेऽपिवा । केन्द्रत्रिकोणलाभस्थे बुधे वर्गबलैर्युते ।।६५।। सूर्य की दशा में अपने उच्च राशि वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा ११ में गये हुये अपने वर्ग में बली बुध के अन्तर में।।६५।। राज्यलाभं महोत्साहं दारपुत्रादि सौख्यकृत् । महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् ।।६६।। राज्य का लाभ बड़ा उत्साह स्त्री पुत्रादि को सुख, राजा की प्रसन्नता से वाहन, वस्त्र आभूषण।।६६।। पुण्यतीर्थकलाप्राप्तिर्गृहे गोधनसंकुलम् । भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते लाभवृद्धिकरोभवेत् ।।६७।। पुण्यतीर्थ, कला के ज्ञान की प्राप्ति, गृह में गोधन की वृद्धि होती है। यदि ९।११ भाव के स्वामी से युत हो तो लाभ में वृद्धि करता है।।६७।। भाग्यपंचमकर्मस्थे सन्मानो भवति ध्रुवम् । स्वकर्मधर्मबुद्धिश्च गुरुपित्रद्विजार्चनम् ।।६८।। यदि बुध ९।५।१० भाव में हो तो सम्मान होता है। अपने धर्मकर्म में वृद्धि गुरु, पिता ब्राह्मण का पूजन।।६८।। धनधान्यादिसंयुक्तं विवाहं पुत्रसम्भवम् । दायेशाच्छुभरांशिस्ये सौम्यभुक्तौ महत्सुखम् ।।६९।।