भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 456

४५८ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । धन, धान्य से युक्त, विवाह और पुत्र का लाभ होता है। दशेश से शुभ राशि में हो तो बड़ा सुख ।।६९।। वैवाहिकं यज्ञकर्म दान धर्म जपादिकम् । स्वनामांकितपद्यानि नामद्वयमथापि वा ।।७०।। वैवाहिक यज्ञ धर्म, जप आदि होते हैं, नामांकित पद्य बनते हैं ।।७०।। भोजनाम्बरभूषाप्तिरमरेशो भवेन्नरः । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे रिष्फगे नीचगेऽपिवा ।।७१।। भोजन वस्त्र की प्राप्ति और इन्द्र के समान सुख देता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में वा नीचराशि में हो तो ।।७१।। देहपीडा मनस्तापो दारपुत्रादिपीडनम् । भुक्त्यादौ दुःखमाप्नोति मध्येकिञ्चित्सुखावहम् ।।७२।। शरीर में पीड़ा मन में सन्ताप, स्त्री पुत्रादि को कष्ट होता है। तथा अन्तर के आरम्भ में दुःख मध्य में कुछ सुख ।।७२।। अन्ते तु राजभीतिश्च गमनागमनं तथा । द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं ज्वरादिकम् ।।७३।। और अन्त में राजभय और गमनागमन होता है। २।७ भाव के स्वामी हो तो देह में जड़ता और ज्वर आदि से कष्ट होता है ।।७३।। विष्णुनामसहस्रंच ह्यन्नदानं च कारयेत् । रजतप्रतिमादानं कुर्यादारोग्य प्राप्तये ।।७४।। आरोग्यता के लिये विष्णुसहस्र स्तोत्र का पाठ, अन्नदान और चाँदी की प्रतिमा का दान करना चाहिये ।।७४।। अथ रविदशायाकेत्वन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते केतौ देहपीडा मनोव्यथा । अर्थव्ययं राजकोपं स्वजनादिरुपद्रवम् ।।७५।। सूर्य की दशा में केतु के अन्तर में शरीर में पीड़ा, मन में कष्ट धन का व्यय, राजभय, अपने ही लोगों से उपद्रव होता है ।।७५।। लग्नाधिपेन संयुक्ते आद्ये सौख्यं धनागमम् । मध्ये तत्क्लेशमाप्नोति मृतवार्तागमं वदेत् ।।७६।। लग्नेश से युत हो तो पहले सुख धन का लाभ होता है, मध्य में उन्हीं क्लेशों