भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५९ को पाता है और अन्त में मरण सन्देश को सुनता है।।७६।। षष्ठाष्टमव्ययेचैवं दायेशात्पापसंयुते । कपोलदंतरोगश्च मूत्रकृच्छ्रस्य संभवम् ।।७७।। दाशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो कपोल और दांत का रोग और मूत्रकृच्छ्र रोग की संभावना होती है।।७७।। स्थानविच्युतिरर्थस्य मित्रहानिः पितुर्मृतिः । विदेशगमनं चैव शत्रुपीड़ा महद्भयम् ।।७८।। स्थान और धन की हानि, मित्र की हानि, पिता की मृत्यु, विदेश यात्रा शत्रुपीड़ा और बड़ा भय होता है।।७८।। लग्नादुपचये केतौ योगकारकसंयुते । शुभांशे शुभवर्गे च शुभकर्म फलप्रदम् ।।७९।। लग्न से उपचय (३।६।१०।११) स्थान में केतु योगकारक ग्रह से युत हो शुभांश से शुभ राशि में हो तो शुभकर्म होते हैं।।७९।। पुत्रदारादिसौख्यं च सन्तोषं प्रियवर्द्धनम् । विचित्रवस्त्रलाभं च यशोवृद्धिः सुखावहा ।।८०।। पुत्र स्त्री आदि को सुख, संतोष और प्रिय वस्तुओं की वृद्धि, विचित्र वस्त्रों का लाभ, यश की वृद्धि और सुख होता है।।८०।। द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युभयं वदेत् । दुर्गाजपं च कुर्वीत छागदानं तथैव च । महामृत्युंजय जपं कुर्याच्छान्तिमवाप्नुयात् ।।८१।। द्वितीयेश वा सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है! शान्ति के लिये दुर्गापाठ, बकरी का दान और महामृत्युंजय का जप कराना चाहिये।।८१।। अथ रविदशायां शुक्रान्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते शुक्रे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपिवा । स्वोच्चे मित्रस्ववर्गस्थे हृष्टस्त्री भोगसम्पदाम् ।।८२।। सूर्य की दशा में त्रिकोण वा केन्द्र में गये हुये वा अपने उच्च वा मित्र वा अपने वर्ग में गये हुये शुक्र के अन्तर में प्रसन्न स्त्री का भोग, सम्पत्ति।।८२।। ग्रामान्तरप्रयाणं च ब्राह्मणप्रभुदर्शनम् । राज्यलाभं महोत्साहं छत्रचामरवैभवम् ।।८३।।